न्यायिक सक्रियता और न्यायपालिका की भूमिका: हाल के फैसलों के विशेष संदर्भ में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संविधान को सर्वोच्च माना जाता है, तथा उसकी रक्षा और सही व्याख्या करने का उत्तरदायित्व स्वतंत्र न्यायपालिका को सौंपा गया है। भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत निहित है, जिसके तहत विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका उनकी समीक्षा करती है। हालांकि, समय-समय पर जब कार्यपालिका या विधायिका अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में विफल होती हैं या जनहित की उपेक्षा करती हैं, तब न्यायपालिका एक संरक्षक के रूप में आगे आती है। इसे ही न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कहा जाता है। 1. न्यायिक सक्रियता का उद्गम और इसका विस्तृत अर्थ न्यायिक सक्रियता का तात्पर्य न्यायपालिका द्वारा केवल पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी या मुकदमों तक सीमित दृष्टिकोण को त्यागकर, समाज के व्यापक हितों में सकारात्मक और मार्गदर्शक भूमिका निभाने से है। जनहित याचिका (PIL) की क्रांति: भारत में 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के शुरुआती दौर...
मौलिक अधिकार बनाम नीति निर्देशक तत्व: क्या डगमगा रहा है संविधान का संतुलन? भारतीय संविधान केवल कानूनों का एक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत सामाजिक दस्तावेज है जो देश के नागरिकों को स्वतंत्रता और अधिकार देता है, साथ ही राज्य को एक कल्याणकारी व्यवस्था बनाने का मार्ग भी दिखाता है। इस व्यवस्था के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ हैं— मौलिक अधिकार (Fundamental Rights - भाग III) और राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy - भाग IV) । हाल के वर्षों में नीति निर्माण, न्यायिक फैसलों और सामाजिक बहसों के बीच यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि क्या इन दोनों के बीच का नाजुक संतुलन बिगड़ रहा है? आइए, इस विषय पर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विस्तार से चर्चा करते हैं। प्रस्तावना: संविधान की दो धुरियाँ भारतीय संविधान के भाग III में वर्णित मौलिक अधिकार नागरिकों के व्यक्तिगत विकास की गारंटी देते हैं, जबकि भाग IV में दिए गए नीति निर्देशक तत्व राज्य को एक समतामूलक और कल्याणकारी समाज के निर्माण के लिए निर्देश देते हैं। मौलिक अधिकार: व्यक्ति-केंद्रित और न्यायोचित (Justiciable) हैं। ...