क्या वर्तमान में समाजवाद फिर से प्रासंगिक हो रहा है? वैश्वीकरण, असमानता और नए दौर की राजनीति पिछली सदी के अंतिम दौर में जब सोवियत गणराज्य का विघटन हुआ और वैश्विक अर्थव्यवस्था ने मुक्त बाजार तथा उदारीकरण का मार्ग अपनाया, तब वैचारिक मंचों पर यह धारणा बना ली गई थी कि समाजवाद का अध्याय सदैव के लिए बंद हो चुका है। मुक्त व्यापार और पूँजीवादी व्यवस्था को मानवीय विकास का अंतिम पड़ाव घोषित कर दिया गया था। किंतु वर्तमान परिदृश्य में, एक बार फिर वैश्विक स्तर पर नीतिगत बैठकों से लेकर अकादमिक बहसों तक में समाजवादी दृष्टिकोण, कल्याणकारी प्रणालियों और सामाजिक समता की गूंज सुनाई देने लगी है। यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या इक्कीसवीं सदी के इस चुनौतीपूर्ण दौर में समाजवाद अपनी प्रासंगिकता पुनः सिद्ध कर रहा है, या यह केवल पूँजीवादी बाजार की विफलताओं से उत्पन्न हुआ एक तात्कालिक असंतोष मात्र है? यहाँ हम समकालीन वास्तविकताओं और उदाहरणों के माध्यम से इसी वैचारिक तथा व्यावहारिक पक्ष की समीक्षा करेंगे। 1. मुक्त बाजार और नव-उदारीकरण के समक्ष उभरते गंभीर संकट जिस खुली बाजार व्यवस्था ने दुनिया को ती...
भारतीय राजनीति में संपूर्ण क्रांति और समाजवादी आंदोलनों का प्रभाव और आज के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता भारतीय राजनीति के इतिहास में समाजवादी आंदोलनों और लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में हुए 'संपूर्ण क्रांति' आंदोलन ने देश की वैचारिक और लोकतांत्रिक दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया था। लेकिन क्या ये आंदोलन केवल इतिहास के पन्नों तक सीमित हैं, या आज की समकालीन राजनीति में भी इनकी गूंज सुनाई देती है? इस ब्लॉग में हम संपूर्ण क्रांति और समाजवादी आंदोलनों के ऐतिहासिक प्रभावों के साथ-साथ यह भी समझेंगे कि आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य (2026 के वर्तमान उदाहरणों) में ये विचार किस रूप में जीवित हैं। 1. समाजवादी आंदोलन: वैचारिक आधार और सामाजिक न्याय की नींव आजादी के बाद समाजवाद ने पूंजीवादी असमानता और पारंपरिक सामाजिक भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत वैचारिक विकल्प पेश किया था। डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और जेपी जैसे नेताओं ने इसे जन-जन तक पहुंचाया। जाति और वर्ग का समन्वय: लोहिया जी का नारा था — "संसदीय सीमित करो, चौखंबा राज लाओ" । उन्होंने भारतीय समाज की मु...