क्षेत्रीय दल और भारतीय संघवादः उभरते आयाम और केंद्र-राज्य संबंध भारतीय राजनीति की संरचना में क्षेत्रीय दलों (Regional Parties) का उदय और विकास इस बात का प्रमाण है कि विविधता से परिपूर्ण देश में केंद्रीकृत शासन की सीमाएं क्या हैं। भारतीय संघवाद (Indian Federalism) को केवल एक संवैधानिक ढांचा नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली राजनीतिक वार्ताओं की प्रक्रिया माना गया है। इस व्यवस्था में क्षेत्रीय दलों ने न केवल राज्यों की आकांक्षाओं को स्वर दिया है, बल्कि केंद्र और राज्यों के पारस्परिक संबंधों (Centre-State Relations) की परिभाषा को भी पूरी तरह बदल दिया है। 1. भारतीय संघवाद की प्रकृति और क्षेत्रीय दलों की अनिवार्यता संविधान निर्माताओं ने एक मजबूत केंद्र की कल्पना करते हुए भारत को राज्यों का संघ बनाया, जिसे अक्सर 'सहयोगी संघवाद' या 'अर्ध-संघीय' व्यवस्था कहा जाता है। शुरुआती दौर में एकछत्र राजनीतिक प्रभुत्व के कारण क्षेत्रीय आवाजों को दबाने या नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति देखी गई थी। परंतु समय के साथ, क्षेत्रीय अस्मिता, भाषाई विविधता, और असमान क्षेत्रीय विकास ने ऐसे राजनीतिक दलों ...
एंतोनियो ग्राम्सी का हेजेमनी (आधिपत्य) सिद्धांत: मीडिया और राजनीति के गठजोड़ पर इसका प्रभाव अक्सर हम राजनीति को केवल बल, कानून, पुलिस और संसद के दायरे में देखते हैं। लेकिन क्या कभी सोचा है कि शासक वर्ग बिना किसी बड़े विद्रोह के आम जनता की सहमति कैसे हासिल कर लेता है? इतालवी मार्क्सवादी दार्शनिक एंतोनियो ग्राम्सी (Antonio Gramsci) ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए 'हेजेमनी' (Cultural Hegemony / सांस्कृतिक आधिपत्य) का प्रसिद्ध सिद्धांत दिया। आधुनिक समय में यह सिद्धांत मीडिया और राजनीति के खतरनाक गठजोड़ को समझने के लिए सबसे बड़ा वैचारिक हथियार बन चुका है। आइए, इस लेख में विस्तार से समझते हैं कि ग्राम्सी का यह विचार आज के दौर में मीडिया और सत्ता के खेल को कैसे प्रभावित कर रहा है। 1. ग्राम्सी का हेजेमनी (आधिपत्य) सिद्धांत क्या है? पारंपरिक मार्क्सवादी विचारधारा मानती थी कि पूँजीपति वर्ग अपनी ताक़त और बल (दमन) के दम पर समाज पर राज करता है। ग्राम्सी ने इस सोच को चुनौती दी और कहा कि केवल 'कोर्सेव पावर' (Coercive Power - बल प्रयोग) से लंबे समय तक राज नहीं किया जा सकता। इसके...