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एम एन राय के विचारों की प्रासंगिकता

आज के आधुनिक, तकनीकी और तेजी से बदलते लोकतांत्रिक दौर में, जहाँ दुनिया भर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कई तरह के गंभीर संकटों से जूझ रही हैं, एम० एन ० राय (M.N. Roy) का 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (Radical Humanism / नव-मानववाद) पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। आज लोकतंत्र के नाम पर जो राजनीति हो रही है, उसने राय की उस आशंका को सच साबित कर दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि पारंपरिक दलीय लोकतंत्र धीरे-धीरे तानाशाही या जनता के शोषण का जरिया बन जाता है। आज के दौर में एम० एन ० रॉय के विचारों की प्रासंगिकता और महत्व को निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है: 1. दलीय राजनीति (Party Politics) की विसंगतियों का समाधान आज की स्थिति: वर्तमान समय में राजनीतिक दल केवल 'सत्ता प्राप्ति की मशीन' बनकर रह गए हैं। चुनाव जीतने के लिए जाति, धर्म, धन और बाहुबल का खुलकर इस्तेमाल होता है, और आम नागरिक केवल पांच साल में एक बार वोट देने वाला मोहरा बनकर रह जाता है। राय की प्रासंगिकता: राय ने बहुत पहले ही चेतावनी दी थी कि बहुदलीय प्रणाली जनता को शक्तिहीन बना देती है। उनका 'संगठनह...
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एम एन राय और रेडिकल पार्टी

एम० एन ० राय (M. N. Roy) का राजनीतिक सफर भारतीय इतिहास के सबसे रोमांचक, क्रांतिकारी और वैचारिक रूप से परिवर्तनकारी अध्यायों में से एक है। उन्होंने एक कट्टर राष्ट्रवादी से लेकर कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय नेता और अंततः 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (नव-मानववाद) के प्रणेता तक का लंबा सफर तय किया। इसी वैचारिक यात्रा के अंतिम और सबसे परिपक्व चरण में उन्होंने 'रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी' (Radical Democratic Party - RDP) की स्थापना की थी। एम० एन ० राय के राजनीतिक सफर के मुख्य पड़ाव और रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी के गठन की पूरी कहानी निम्नलिखित है: एम० एन ० राय के राजनीतिक सफर के मुख्य पड़ाव क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का दौर (1905–1915): अपने शुरुआती जीवन में राय (मूल नाम: नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य) बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति' से जुड़े थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ कई सशस्त्र क्रांतिकारी गतिविधियों और डकैतियों (जैसे बारिज़ाड डकैती) में हिस्सा लिया। हथियारों के लिए विदेशों से संपर्क साधने के सिलसिले में वे कई देशों की यात्रा पर निकले और भूमिगत हो गए। कम्युनिस्ट ...

एम एन राय के नव मानववाद पर विचार

एम० एन ० राय (M. N. Roy) द्वारा प्रतिपादित 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (Radical Humanism - आमूल परिवर्तनवादी मानवतावाद) या 'नव-मानववाद' बीसवीं शताब्दी के भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अत्यंत मौलिक और क्रांतिकारी दस्तावेज है। सोवियत साम्यवाद के कठोर अनुभवों और मार्क्सवादी आर्थिक नियतिवाद से मोहभंग होने के बाद राय ने यह स्पष्ट किया कि समाजवाद का असली उद्देश्य केवल आर्थिक उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मनुष्य की पूर्ण स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है। एम० एन ० राय के रैडिकल ह्यूमैनिज्म के मुख्य सिद्धांत और समाज के पुनर्गठन की उनकी कार्ययोजना को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है: रैडिकल ह्यूमैनिज्म के मुख्य सिद्धांत मनुष्य सभी चीजों का केंद्र है (Man is the Measure of Everything): राय के दर्शन का मूल आधार व्यक्ति है। उनके अनुसार, राज्य, समाज, राष्ट्र या कोई भी संस्था साध्य नहीं है, बल्कि वे साधन मात्र हैं। साध्य केवल स्वतंत्र मनुष्य है। समाज और राज्य का अस्तित्व इसलिए है ताकि वे मनुष्य के विकास और उसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर सकें। स्वातंत्त्य, बुद्धि और नैतिकता (...

एम एन राय और महात्मा गाँधी

एम० एन ० राय (M. N. Roy) और महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) 20वीं सदी के भारत के दो ऐसे महान चिंतक हैं, जिन्होंने आधुनिक सभ्यता, राज्य व्यवस्था और मनुष्य के विकास पर बेहद मौलिक और दूरदर्शी विचार रखे। शुरुआती दौर में दोनों की विचारधाराओं में जमीन-आसमान का फर्क था, लेकिन जैसे-जैसे एम० एन ० राय का मार्क्सवाद से मोहभंग हुआ और वे 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (Radical Humanism) की ओर बढ़े, उनके कई बिंदु गांधीजी के विचारों के करीब आते दिखाई दिए। एम० एन ० राय के 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' और महात्मा गांधी के विचारों के बीच की मुख्य समानताएं और अंतर निम्नलिखित हैं: मुख्य समानताएं (Similarities) व्यक्ति की नैतिकता और अंतरात्मा सर्वोपरि: गांधीजी: गांधीजी के अनुसार, सत्य और अहिंसा का आधार व्यक्तिगत अंतरात्मा (Conscience) और नैतिक शुद्धता है। उनके लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता अनिवार्य थी। राय (रैडिकल ह्यूमैनिज्म): अपने अंतिम दौर में राय इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कोई भी सामाजिक क्रांति तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक मनुष्य नैतिक रूप से स्वतंत्र और जाग्रत न हो। उनके अनुसार, "मनुष्य सभी ची...

एम एन राय के राजनीतिक विचार

मानवेंद्रनाथ राय (M. N. Roy) भारतीय राजनीतिक और दार्शनिक इतिहास के उन अद्वितीय विचारकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में वैचारिक धाराओं का एक लंबा और क्रांतिकारी सफर तय किया। वे पहले भारत के प्रमुख कम्युनिस्ट नेता और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (Comintern) के शीर्ष नेताओं में शामिल रहे, लेकिन बाद में सोवियत संघ के कठोर साम्यवाद से मोहभंग होने के बाद उन्होंने 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (Radical Humanism - आमूल परिवर्तनवादी मानवतावाद) या 'नव-मानववाद' के रूप में एक नए और मौलिक राजनीतिक दर्शन की स्थापना की। एम० एन ० राय का जीवन परिचय और वैचारिक विकास एम० एन ० राय (मूल नाम: नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य) का जन्म 1887 में पश्चिम बंगाल के 24 परगना जिले में हुआ था। अपने शुरुआती दिनों में वे बंगाल के एक क्रांतिकारी राष्ट्रवादी (अनुशीलन समिति) थे। विदेश यात्रा के दौरान वे मार्क्सवाद के संपर्क में आए, मैक्सिको की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की और 1920 में ताशकंद में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। लेनिन के साथ वैचारिक चर्चाओं और बाद में जोसेफ स्टाल...

वैधता

राजनीति विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में राजनीतिक सिद्धांत (Political Theory) के अंतर्गत 'वैधता' (Legitimacy) एक बेहद महत्वपूर्ण और केंद्रीय अवधारणा है।  राजनीति विज्ञान में 'वैधता' (Legitimacy): अर्थ, स्रोत और आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में इसका महत्व राजनीति विज्ञान और राजनीतिक दर्शन में 'वैधता' (Legitimacy) इस बात का निर्धारण करती है कि शासन व्यवस्था, सत्ता (Power) या सरकार नैतिक और कानूनी रूप से कितनी स्वीकार्य है। सरल शब्दों में कहें तो वैधता का अर्थ "शासन करने के अधिकार" (Right to Rule) से है। यह बल या शक्ति (Force) से पूरी तरह भिन्न है; जहाँ शक्ति डर या जोर-जबरदस्ती पर आधारित होती है, वहीं वैधता जनता की स्वीकृति, सहमति और नैतिकता पर आधारित होती है। 1. वैधता का अर्थ और अवधारणा लैटिन भाषा के शब्द 'Legitimus' (जिसका अर्थ कानून सम्मत या वैध होता है) से 'Legitimacy' शब्द की उत्पत्ति हुई है। राजनीति विज्ञान में जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर (Max Weber) ने वैधता के सिद्धांत को सबसे वैज्ञानिक और व्यापक आयाम दिया। वेबर के अनुसार, सत्ता तभी...

वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका

ज्ञानेश कुमार, मुख्य चुनाव आयुक्त और एसआईआर (SAR/SIR) की भूमिका भारतीय चुनावी इतिहास में चुनाव आयोग (Election Commission of India) के प्रशासनिक सुधारों और चुनावी शुचिता बनाए रखने के प्रयासों का हमेशा से विशेष महत्व रहा है। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण यानी एसआईआर (Special Intensive/Intensive Revision - SIR) को लेकर काफी चर्चा और विमर्श देखने को मिला है। इस ब्लॉग में हम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में एसआईआर प्रक्रिया, उससे जुड़े प्रावधानों और हालिया घटनाक्रमों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करेंगे। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में ज्ञानेश कुमार का परिचय केरल कैडर के 1988 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार ने देश के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कमान संभाली है। अपने लंबे प्रशासनिक करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाई हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर आने के बाद से ही निष्पक्ष, पारदर्शी और त्रुटिहीन मतदाता सूचियां तैयार करना उनके आयोग की प्राथमिकताओं में रहा है। चुनावी प्...