वर्तमान उदाहरणों के साथ भारत की परमाणु नीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सामरिक अध्ययन में किसी भी देश की परमाणु नीति उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा, कूटनीतिक परिपक्वता और वैश्विक शांति के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का आईना होती है। भारत जैसी उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति के लिए परमाणु नीति केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार राष्ट्र के रूप में सामरिक संयम का अनूठा उदाहरण है। वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में (विशेषकर 2026 तक के घटनाक्रमों और उभरते सामरिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए), भारत की परमाणु नीति की प्रासंगिकता और इसके व्यावहारिक अनुप्रयोगों का विस्तार से विश्लेषण निम्नलिखित है: 1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा भारत का परमाणु कार्यक्रम स्वतंत्रता के तुरंत बाद वैज्ञानिक अनुसंधान और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के साथ शुरू हुआ था। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग की नींव रखी थी। हालांकि, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों और भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के कारण भारत को अपनी रक्षा नीति में बदलाव करना पड़ा: 1974 का पोखरण परीक्षण (ऑपरेशन स्माइलिं...
भारतीय विदेश नीति का विकास: निरंतरता और परिवर्तन - आदर्शवाद से सामरिक यथार्थवाद तक भारतीय विदेश नीति एक जीवंत, गतिशील और विकासशील प्रक्रिया है, जो पिछले सात दशकों से अधिक समय से वैश्विक परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से लेकर आज तक, भारत की विदेश नीति ने निरंतरता (Continuity) और परिवर्तन (Change) के एक अनूठे संतुलन को दर्शाया है। यदि हम इसके सफर पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि कैसे भारत अपनी प्राचीन सभ्यतागत और नैतिक प्राथमिकताओं से आगे बढ़कर समकालीन भू-राजनीति की यथार्थवादी और व्यावहारिक वास्तविकताओं को अपना रहा है। आइए, इस वैचारिक विकास के विभिन्न पहलुओं और चरणों को विस्तार से समझें। 1. आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता का दौर (1947–1962): पंचशील और नैतिक कूटनीति आजादी के तुरंत बाद, देश के पहले प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय विदेश नीति की नींव रखी। इस शुरुआती दौर में आदर्शवाद (Idealism) , नैतिक मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय शांति की गूंज स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): शीत युद्ध के दौरान जब दुनिय...