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Showing posts from January, 2021

अरस्तू का संविधानों का वर्गीकरण

अरस्तू ने अपनी  पुस्तक पालिटिक्स की तीसरी पुस्तक में 6 से 8 वें अध्याय में संविधान की व्याख्या की तथा विभिन्न प्रकार के संविधानो का उल्लेख किया । अरस्तू ने 158 देशों के संविधान का अध्ययन किया जिसके आधार पर संविधानों का वर्गीकरण किया। संविधान का अर्थ बताते हुए अरस्तू ने कहा संविधान राज्य का एक ऐसा संगठन है जिसका संबंध सामान्यतया राज्य के पदों के निर्धारण से है विशेषकर ऐसे पदों के निर्धारण से है, विशेषकर ऐसे पदों के निर्धारण से जो राजनीतिक दृष्टि से सर्वोच्च हो। अरस्तू मानता है संविधान राज्य की सर्वोच्च शक्ति की व्यवस्था करता है जो यह बताता है कि यह शक्ति किसमें निहित है । इस आधार पर संविधान का स्वरूप इस बात से निश्चित होता है कि उसके द्वारा अंतिम रूप में शासन सत्ता को कहाँ केंद्रित किया गया है  क्योंकि जिन व्यक्तियों के हाथ में संप्रभुता निहित होती है उसी के आधार पर संविधान के स्वरूप का निर्धारण होता है। अरस्तू के अनुसार "सत्ता की सामान्य व्यवस्था जिसके माध्यम से राज्य के कार्यों का संचालन किया जाता है, संविधान है। राज्य का सार भी संविधान है।" अरस्तू ने संविधान का वर्गीकरण दो ...

अरस्तू के नागरिकता संबंधी विचार

अरस्तू ने अपने ग्रन्थ पालिटिक्स    की तीसरी पुस्त्तक में नागरिकता संबंधी विचार दिये । उसके अनुसार राज्य (Polis) नागरिको (Politia) का एक समुदाय है । नागरिक कौन हैं इसे बताने से पहले वह यह बताता है कि नागरिक कौन नहीं है।  सिर्फ राज्य में निवास करने की दृष्टि से किसी भी व्यक्ति को नागरिक नहीं माना जा सकता- क्योंकि वहाँ विदेशी तथा दास भी निवास करते हैं।  अभियोग चलाने का अधिकार भी किसी भी व्यक्ति को नागरिक नहीं बनाता क्योंकि यह अधिकार विदेशियों को संधि से प्राप्त हो जाता है।  नागरिक की संतान को भी नागरिक नहीं माना जा सकता क्योंकि यह बात पुराने राज्यों के लिए उपयुक्त हो सकती है परन्तु नये बसाए हुए राज्यों के लिए नहीं।  जिसकी नागरिकता छीन ली गयी हो अथवा जिसे देश निकाला दिया जा चुका है , उसे भी नागरिक नहीं माना जा सकता है । अरस्तू ने नागरिकता की परिभाषा देते हुए कहा "  जो व्यक्ति स्थायी रूप से न्याय के प्रशासन में तथा राजकीय पदों को ग्रहण करने में भाग लेता है वह नागरिक है।" अरस्तू नागरिकता की परिभाषा ताकालीन समय में एथेंस में प्रचलित प्रत्यक्ष जनतंत्र के आधार ...

अरस्तु

राजनीति विज्ञान के जनक अरस्तू का जन्म 384 ई० पू० में स्टेगिरा के थ्रेसियन नगर में हुआ था। इनके पिता निकोमैकस मकदूनिया के राज दरबार में वैद्य थे। पारिवारिक प्रथा के अनुसार अरस्तू को भी चिकित्सक बनने का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ । चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने के कारण ही अरस्तू में वैज्ञानिक  दृष्टिकोण का विकास हुआ जिसका बाद में उसने राजनीतिशास्त्र के अध्ययन हेतु प्रयोग किया । अपने पिता की मृत्यु के पश्चात वह प्लेटो की अकादमी की ख्याति से प्रभावित होकर 17 वर्ष की आयु में एथेंस जाकर प्लेटो का शिष्य बन गया। अरस्तू की मुख्य पुस्तक पालिटिक्स, कॉन्स्टीट्यूशन्स, रिटोरिक्स, पोइटिक्स, इथिक्स आदि हैं। अरस्तू ने शोध एवं वैज्ञानिक एवं आगमन पद्धति को अपनाया | अरस्तू के दास प्रथा पर विचार -  दास प्रथा यूनानी सभ्यता की बुनियाद थी । नगर राज्यों के नागरिकों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादन का सारा कार्य दासों के द्वारा किया जाता था। एण्टीफोन जैसे कुछ सोफिस्ट विचारकों ने मानव समानता के सिद्धान्त का प्रतिपादन कर इसका विरोध किया था। किंतु अपनी रुढिवादिता के कारण अरस्तू ने इसका समर्थन कि...

संयुक्त राज्य अमेरिकी व्यवस्थापिका

सयुंक्त राष्ट्र अमेरिका का संविधान राजनीतिक शक्तियों को राष्ट्रीय नीतियों का रुप देने का उत्तरदायित्व कांग्रेस को सौंपता है। संविधान का प्रथम अनुच्छेद सामान्य विधायिनी शक्तियों को कांग्रेस को सौंपता है। कांग्रेस एक  द्विसदनात्मक सभा है ।  अनुच्छेद 1 में लिखा है कि व्यवस्थापन संबंधी समस्त   शक्तियाँ संयुक्त राज्य की एक कांग्रेस में निहित होगी। लेकिन व्यवहार में कांग्रेस को न केवल विधायी वरन् प्रशासनिक व न्यायिक शक्तियां भी प्राप्त हैं । कांग्रेस की विधायी शक्तियों में मुद्रा, नाप-तौल, संघीय न्यायालयों का गठन सम्मिलित है । कांग्रेस को विधायी शक्तियों के अन्तर्गत प्राप्त प्रदत्त शक्तियों में कर लगाना एवं एकत्रित करना , ऋण चुकाने की व्यवस्था, सुरक्षा की व्यवस्था तथा निहित शक्तियों के अधीन अधिकोष एवं निगम की स्थापना, कृषि की स्थापना एवं नियन्त्रण, विद्युत उत्पादन एवं अतिरिक्त विद्युत का विक्रय , जन कल्याण आदि व्यय संबंधी विषय सम्मिलित है । समवर्ती सूचियों वाले विषय पर संघीय एवं राज्यों की सरकारों को विधि निर्माण का अधिकार है।  कांग्रेस दोनों सदनों के सदस्यों के लिए न...

संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान

संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्तर में कनाडा, दक्षिण में मैकिसको, पश्चिम में अटलान्टिक महासागर और पूर्व दिशा में प्रशान्त महासागर है । संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान निर्माण 1787 में हुआ ,इसके पीछे लगभग 150  वर्षों का संघर्षपूर्ण इतिहास रहा ।संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान एक आदर्श प्रजातंत्रात्मक राज्य की स्थापना करता है। अमेरिका का संविधान विश्व के लिखित संविधानों में सर्वोच्च है । संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान विश्व का प्रथम लिखित संविधान है। इसका ब्रिटेन के संविधान की तरह क्रमिक विकास नहीं बल्कि फिलाडेल्फिया सम्मेलन द्वारा निर्माण हुआ है । यह संविधान विश्व के लिखित संविधानों में सर्वाधिक संक्षिप्त संविधान है । इसमें 4000 मात्र शब्द है जो आधे घण्टे में  पढ़े जा सकता है । संविधान में मात्र 7 अनुच्छेद हैं। साथ ही साथ  संविधान में बीते वर्षो में मात्र 27 संशोधन किये गये हैं। क्योंकि यह कठोर संविधान है । संविधान में जनता को आत्म निर्णय का अधिकार प्राप्त है । संविधान की सम्प्रभुता जनता में निहित है । संविधान के अनुसार राष्ट्रपति देश का वास्तविक प्रधान है । संघीय राज्यों की...

प्लेटो का उपादर्श राज्य

प्लेटो ने अपने ग्रन्थ' लॉज' में एक ऐसे राज्य की स्थापना की जिसमें वह आदर्शों का प्रतिबिम्ब कानून के आधार पर देख सके यह उपादर्श राज्य के सिद्धान्त से हटकर ला । प्लेटो अपने उपादर्श राज्य की स्थापना में भौगोलिक परिस्थितियों को बहुत महत्व प्रदान करता है । प्लेटो मानता है कि भौगोलिक परिस्थितियां नागरिक के चरित्र पर गहरा प्रभाव डालती है। प्लेटो अपने उपादर्श राज्य को समुद्र की निकटता से दूर रखना चाहता है। वह मानता है यदि राज्य समुद्र के निकट होगा तो राज्य के निवासी समुद्र के माध्यम से व्यापार करने लगेगें जिससे वे भ्रष्ट एवं दुषित हो जायेगें। वह मानता है कि समुद्र से दूर राज्य अच्छा होता है । वह अपने उपादर्श राज्य को समुद्र के तट से दूर आत्मनिर्भर और विदेशी व्यापार से मुक्त रखना चाहता है । समुद्री व्यापार का वह इसलिए विरोधी था कि उससे नागरिकों में धन कमाने की प्रवृत्ति जन्म लेती है जो उन्हें स्वार्थी और बेईमान बना देती है । अतः प्लेटो का उपादर्श राज्य कृषि प्रधान, आत्मनिर्भर एवं स्वालम्बी राज्य है । उसके अनुसार उपादर्श राज्य की जनसंख्या 5040 होनी चाहिए। प्लेटो द्वारा यह संख्या काफी सोच...

ब्रिटिश राजमुकुट(British Crown)

ब्रिटेन में संसदीय शासन व्यवस्था की विशेषता है कि इसके दो कार्यपालिका प्रधान होते हैं औपचारिक और वास्तविक । देश की शासन सत्ता कार्यपालिका के वास्तविक प्रधान के हाथ में होती है किंतु वास्तविक प्रधान राज्याध्यक्ष नहीं होता । इसके विपरीत राज्य का अध्यक्ष नाममात्र का अध्यक्ष होता है उसके हाथ वास्तविक शक्ति कोई नहीं होती इसलिए उसे कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान कहते हैं । वास्तविक शक्तियों का प्रयोग प्रधानमंत्री और कैबिनेट के द्वारा किया जाता है । जिसे सैद्धांतिक रूप से गौण स्थिति प्राप्त है । वर्तमान समय में साम्राज्ञी एलिजाबेथ द्वितीय सम्राट पद पर आसीन हैं । उत्तराधिकारी साम्राज्ञी के ज्येष्ठ पुत्र प्रिंस चार्ल्स प्रिंस ऑफ वेल्स हैं। सम्राट और राजमुकुट-  सम्राट वह व्यक्ति होता है जो एक विशेष समय पर ब्रिटिश राज्य के प्रमुख पद पर आसीन होता है। राजमुकुट राज्य शक्ति का वह प्रतीक है जिसे सम्राट अपने सिर पर धारण करता है । यह राजमुकुट विधिवत समारोह के बाद धारण किया जाता है तभी उसे शासन की समस्त शक्तियाँ प्राप्त होती है। शाब्दिक अर्थ में राजमुकुट राजसत्ता का वह प्रतीक है जिसे सम्राट राजपद ग्रह...

प्लेटो के आदर्श राज्य पर विचार

प्लेटो के ग्रंथ ' रिपब्लिक' का मुख्य उद्देश्य एक ऐसे आदर्श राज्य निर्माण करना है जो सभी प्रकार के विकारों और भ्रष्टाचारों से मुक्त हो । उसका आदर्श राज्य' अच्छाई अथवा सदगुणों' का मूर्त रूप है । प्लेटो आदर्श राज्य के निर्माण कल्पना की उड़ान वहाँ तक भरता है जहाँ तक संभव है । इस दृष्टि से वह इस बात की चिंता नहीं करता है कि कल्पना के आधार पर वह जिन सिद्धान्तों तथा आदर्शों की स्थापना कर रहा है वे व्यावहारिक धरातल पर आधारित है भी या नहीं । उसके लिए आदर्श सर्वोपरि महत्व के हैं उनकी व्यावहारिकता नहीं। प्लेटो के आदर्श राज्य के उद्देश्य न्याय की स्थापना - प्लेटो के न्याय का स्वरूप आधुनिक न्याय के स्वरूप के अनुसार विधि सम्मत अथवा कानूनी नहीं। उसका न्याय नैतिकता अथवा सदगुणों का पर्याय है । न्याय से उसका तात्पर्य एक कार्य विभाजन और निर्वाह की एक ऐसी व्यवस्था से है जो व्यक्ति के मूल नैसर्गिक गुण पर आधारित है । ये नैसर्गिक गुण है ज्ञान, शौर्य और तृष्णा । प्लटो के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में अन्य गुणों की तुलना में एक गुण प्रधान होता है । उसी के आधार पर व्यक्ति का कार्य निर्धारित होता ह...

ब्रिटिश संसद

ब्रिटिश संसद सबसे प्राचीन कानून बनाने वाली संस्था है। इसके दो भाग थे और वर्तमान में भी हैं । लार्ड सभा एवं कॉमन सभा नार्मन काल में जो महापरिषद थी वही बाद में धीरे- धीरे ब्रिटिश संसद बनी । ब्रिटिश संसद सम्राट , लार्ड सभा और कॉमन सभा इन तीन अंगो से मिलकर बनी है। वैधानिक दृष्टि से ब्रिटिश संसद संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न है। संसद कोई भी कानून बना सकती है अथवा रद्द कर सकती है। कानूनी प्रभुत्व शक्ति राजा को संसद से प्राप्त है परन्तु वास्तव में वह शक्ति संसद के पास रहती है। लोकसभा की सदस्य संख्या निश्चित नहीं है और यह उत्तर उत्तर बढ़ती ही जा रही है क्योंकि  इसमें सम्राट प्रधानमंत्री की सिफारिश पर जितने नवीन सदस्य आवश्यक समझे नियुक्त कर सकता है लार्ड सभा-  लार्ड सभा लोकतंत्रात्मक प्रणाली की कुलीन तंत्रीय संस्थ है क्योंकि इसके सदस्य वंशानुगत आधार पर चुनकर आते हैं। लाार्ड सभा की सदस्य  लोकसभा की सदस्य संख्या निश्चित नहीं है और यह उत्तर उत्तर बढ़ती ही जा रही है क्योंकि  इसमें सम्राट प्रधानमंत्री की सिफारिश पर जितने नवीन सदस्य आवश्यक समझे नियुक्त कर सकता है अवकाश प्राप्त प्रधानमंत्...

ग्रेट ब्रिटेन के संविधान की विशेषताएं

ग्रेट ब्रिटेन यूनाइटेड किंगडम के साथ भारत की घनिष्ठ संबंध रहे हैं हमारी अपनी राजनीतिक व्यवस्था विशेषकर संसदीय लोकतंत्र ब्रिटेन की राजव्यवस्था पर काफी कुछ आधारित है आकार के आधार पर यह देश छोटा जरूर है लेकिन इसके विषय में यह उक्ति है कि ब्रिटिश साम्राज्य में सूर्य कभी भी अस्त नहीं होता । विश्व की 5 शक्तियों में से एक ग्रेट ब्रिटेन एक है । इसी आधार पर ब्रिटेन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य बनाया गया था । ब्रिटिश संविधान एक विकसित संविधान है ।इसने 1400 वर्षों के आधार पर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त किया है और अब भी विकास में है | ब्रिटेन ने अपनी परिस्थितियों के अनुसार जिस संविधान को अपनाया उसकी अपनी कुछ विशेषताएं हैं उन विशेषताओं के मुख्य बिन्दु है -    विकसित संविधान भारत ,अमेरिका, फ्रांस और अन्य देशों के संविधान का निर्माण विशेष संविधान सभा द्वारा किया गया जबकि ब्रिटिश संविधान का निर्माण नहीं विकास हुआ है और वर्तमान स्वरूप सदियों के विकास के बाद प्राप्त किया गया है ब्रिटेन में 9 वीं शताब्दी से राजतंत्र की स्थापना 13 वीं सदी में संसद का विधिवत चलन प्रारंभ हुआ 1...

संविधान सभा

संविधान की बात सबसे पहले 1922 में महात्मा गाँधी द्वारा कही गई। उसके पश्चात 1934 में एमएन राय ने संविधान सभा की माँग रखी तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1935 में संविधान की मांग की। जवाहर लाल नेहरू ने 1938 में व्यस्क मताधिकार द्वारा संविधान सभा के निर्माण को स्वीकारा । 1942 में ब्रिटिश सरकार के कैबिनेट मंत्री सर स्टेफोर्ड क्रिप्स ब्रिटिश सरकार प्रारूप के साथ भारत आये परन्तु मुस्लिम लीग द्वारा इसे अस्वीकार कर दिया गया। 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया । नवम्बर 1946 में संविधान सभा का गठन किया गया जिसकी कुल सदस्य संख्या 389 थी जिसमें ब्रिटिश भारतीय प्रांत के 292 , देशी रियासत के 93 तथा मुख्य आयुक्त प्रांत से 4 सदस्य थे। संविधान सभा के चुनावों का परिणाम जुलाई -अगस्त1946 में घोषित हुआ जिसमे कांग्रेस ने208 , मुस्लिम लीग ने 73, यूनियनिस्ट पार्टी 01, यूनियनिस्ट मुस्लिम 01, यूनियनिस्ट शेडयुल कास्ट 01, कृषक प्रजा पार्टी 01, शेडयुल कास्ट फेडरेशन 01, सिक्ख ( नान कांग्रेस)01, कम्युनिस्ट पार्टी 01 तथा इनडिपेन्डेंट पार्टी ने 08 सीटें जीती जिनका कुल योग 296 था । देसी रियासतो की 93 सीटे नहीं भर पायी क्य...

संविधान के स्रोत

भारत देश के  संविधान  निर्माताओं ने संसार के लगभग सभी देशों से अपने देश काल के अनुसार कुछ प्रावधान लेकर नया संविधान तैयार किया | 395 अनुच्छेद में से लगभग 250 अनुच्छेद  हमारे संविधान में भारत सरकार अधिनियम  1935 से  मिलते हुए हैं । भारत सरकार अधिनियम 1935 से न्यायपालिका ,कैग, लोक सेवा आयोग, ब्रिटेन के संविधान से संसदीय शासन ,व्यवस्था  संसदीय विशेषाधिकार , विधि का शासन ,एकल नागरिकता एवं मंत्री मंडल व्यवस्था को लिया गया। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के संविधान से मूल अधिकार, न्यायिक पुनरावलोकन , संविधान की सर्वोच्चता, निर्वाचित राष्ट्रपति और महाभियोग लिया गया । कनाडा के संविधान से संघात्मक  वयवस्था ,केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का बंटबारा तथा अवशिष्ट  शक्तियां केंद्र के पास रखने का प्रावधान लिया गया । आयरलैंड के संविधान से राज्य के नीति निर्देशक तत्व और राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा में मनोनयन की वयवस्था को अपनाया गया । दक्षिण  अफ्रीका के संविधान  से संविधान संशोधन और 368 अनुच्छेद को लिया गया । फ्रांस से समानता ,स्वतंत्रता, बंधुत्व और निर्वा...

प्लूटो का साम्यवाद पर विचार

प्लूटो ने अपने आदर्श राज्य के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दो साधनों को अपनाया: राज्य नियंत्रित शिक्षा संरक्षक वर्ग के लिए संपत्ति और स्त्रियों का साम्यवाद साम्यवादी व्यवस्था का प्रतिपादन करने का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से शासन कला में निपुण एवं सुप्रशिक्षित होने के बाद संरक्षक वर्ग को कंचन और कामिनी से दूर करके पथ भ्रष्टता से बचाना था ।  संरक्षक वर्ग को भ्रष्ट होने के खतरे से सुरक्षित करने के लिए व्यक्तिगत संपत्ति और परिवार व्यवस्था का ही उन्मूलन कर दिया साम्यवाद का प्रतिपादन प्लेटो का मौलिक विचार नहीं था। बल्कि उस समय अनेक नगर राज्यों में साम्यवाद प्रथा थी। उस समय की साम्यवादी व्यवस्था से प्रभावित होकर ही प्लूटो ने यह विचार दिया। प्लूटो के समय स्पार्टा नगर राज्य में शासक वर्ग सार्वजनिक स्थानों पर भोजन करते थे। क्रीट नगर राज्य में सामूहिक कृषि की जाती थी। पाइथागोरस का मानना था " मित्रों के मध्य सभी वस्तुओं पर सभी का सामूहिक स्वामित्व होना चाहिए "|  प्लेटो से पूर्व भी यूरीपाइडीज नामक विचारक ने पत्नियों के साम्यवाद के सिद्धांत का समर्थन किया। इन सभी से प्रेरित होकर प्लेट...

ब्रिटिश संविधान के अभिसमय अथवा वैधानिक परम्पराएं(Conventions of British constitution)

ब्रिटिश संविधान के अभिसमय अथवा वैधानिक परम्पराए जिन्हें जेएस मिल ने संविधान के अलिखित नियम कहा प्रो० डायसी ने संवैधानिक अधिनियम के नाम से पुकारा । एंसन ने संवैधानिक परंपराओं का नाम दिया ये परंपराएं ही ब्रिटिश संविधान के विभिन्न स्रोत हैं । डायसी के अनुसार "संविधान के अधिसमय वे रीति रिवाज या समझौते हैं जिनके अनुसार पूर्ण संपन्न विधानमंडल के विभिन्न अंगों को अपने विवेक आधारित अधिकारों का प्रयोग करना चाहिए चाहे वह सम्राट के परम अधिकार हो या पार्लियामेंट के विशेषाधिकार |" ऑग के अनुसार "  अभिसमय उन समझौतों , आदतों या  प्रथाओं  से मिलकर बनते हैं जो राजनीतिक नैतिकता के मात्र होने पर भी बड़ी से बड़ी सार्वजनिक  सत्ताओं के दिन प्रतिदिन के संबंधो और गतिविधियों के अधिकांश भाग का नियमन करते हैं ।" अभिसमय के लक्षण अभिसमय का स्रोत संसद की कानून निर्मात्री शक्ति न होकर प्रथाएं है । जब ये प्रथाएं धीरे - धीरे प्रयोग में आते आते अपनी उपयोगिता के आधार पर प्रशासन में स्थायित्व प्राप्त कर लेती है तभी उनका रुप अभिसमयों का होता है । इनका पालन लोकमत , पारस्परिक सहमति एवं उपयोगिता के कारण क...

प्लेटो का परिचय

प्लेटो को ऐतिहासिक दृष्टि से  विश्‍व  का प्रथम राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा चिंतक माना जाता है। आपका जन्म  428 ई०पूर्व० एथेंस के कुलीन परिवार में हुआ था। वास्तविक नाम अरिस्तोक्लीज़ था किन्तु कंधे चौड़ा होने  के कारण इनके गुरु सुकरात ने प्लेटो नाम दिया। अपने गुरु से प्लेटो बहुत प्रभावित था। गुरु की मृत्यु बाद के पश्चात 388 ई० पूर्व० में प्लेटो ने एथेंस में  " अकादमी " नामक शिक्षण संस्था की स्थापना की। प्लेटो को दार्शनिक का राजा और राजाओ का दार्शनिक  बनाने वाला कहा जाता है। 347 ई० पूर्व० प्लेटो की मृत्यु हो गयी। प्लेटो ने अनेक ग्रंथो की रचना की।  आपके मुख्य ग्रन्थ रिपब्लिक, स्टेट्समेन, लॉज, अपोलॉजी , क्रीटो, यूथिफ्रो फेडो आदि थे। प्लेटो द्वारा राजनीति का विशद विवेचन रिपब्लिक, स्टेट्समेन और लॉज में किया गया हैं। प्लेटो ने अपने  न्याय के सिद्धांत को साकार रूप देने के लिए आदर्श राज्य की संकल्पना प्रस्तुत की। इसकी व्याख्या उसने  प्रसिद्ध ग्रन्थ रिपब्लिक  ( राज्य व्यवस्था) के अंतर्गत की। प्लेटो का मानना था की समाज की बागडोर दार्शनिको के हाथ में दे ...