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एम एन राय के नव मानववाद पर विचार

एम० एन ० राय (M.N. Roy) द्वारा प्रतिपादित 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' (Radical Humanism - आमूल परिवर्तनवादी मानवतावाद) या 'नव-मानववाद' बीसवीं शताब्दी के भारतीय राजनीतिक दर्शन का एक अत्यंत मौलिक और क्रांतिकारी दस्तावेज है। सोवियत साम्यवाद के कठोर अनुभवों और मार्क्सवादी आर्थिक नियतिवाद से मोहभंग होने के बाद राय ने यह स्पष्ट किया कि समाजवाद का असली उद्देश्य केवल आर्थिक उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मनुष्य की पूर्ण स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है।

एम० एन ० राय के रैडिकल ह्यूमैनिज्म के मुख्य सिद्धांत और समाज के पुनर्गठन की उनकी कार्ययोजना को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:

रैडिकल ह्यूमैनिज्म के मुख्य सिद्धांत

  1. मनुष्य सभी चीजों का केंद्र है (Man is the Measure of Everything):

    • राय के दर्शन का मूल आधार व्यक्ति है। उनके अनुसार, राज्य, समाज, राष्ट्र या कोई भी संस्था साध्य नहीं है, बल्कि वे साधन मात्र हैं। साध्य केवल स्वतंत्र मनुष्य है। समाज और राज्य का अस्तित्व इसलिए है ताकि वे मनुष्य के विकास और उसकी स्वतंत्रता को सुनिश्चित कर सकें।

  2. स्वातंत्त्य, बुद्धि और नैतिकता (Freedom, Reason, and Morality):

    • राय के अनुसार, स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की बौद्धिक और नैतिक मुक्ति है।

    • उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य स्वभाव से तर्कशील और नैतिक होता है। जब मनुष्य अपनी विवेक बुद्धि (Reason) का उपयोग करता है, तभी वह रूढ़ियों, अंधविश्वासों और बाहरी बंधनों से मुक्त होता है।

  3. आर्थिक नियतिवाद का खंडन (Rejection of Economic Determinism):

    • पारंपरिक मार्क्सवाद यह मानता है कि मनुष्य के सारे विचार और इतिहास की हर घटना केवल आर्थिक उत्पादन की प्रणालियों से तय होती है। राय ने इसका खंडन करते हुए कहा कि चेतना और विचार भी इतिहास को बदलने में उतनी ही बड़ी भूमिका निभाते हैं। मनुष्य केवल आर्थिक पुर्जा नहीं है, उसके पास वैचारिक और नैतिक स्वतंत्रता की शक्ति होती है।

  4. धर्म और ईश्वर से मुक्ति (Secular and Scientific Outlook):

    • रैडिकल ह्यूमैनिज्म एक पूरी तरह से भौतिकवादी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसमें पारलौकिक विश्वासों, ईश्वर या धर्म के लिए कोई स्थान नहीं है। राय का मानना था कि ईश्वर या धर्म का भय मनुष्य की बौद्धिक स्वतंत्रता को कुंठित करता है। सच्ची मानवतावाद विज्ञान और तर्क पर आधारित होनी चाहिए।

समाज का पुनर्गठन: राय का व्यावहारिक मॉडल

एम० एन ० राय केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने एक नए और सच्चे लोकतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए एक स्पष्ट ढांचा भी पेश किया:

  1. पारंपरिक दलीय लोकतंत्र (Party Politics) का पूर्ण अस्वीकार:

    • राय का मानना था कि वर्तमान संसदीय लोकतंत्र और दलीय प्रणाली महज एक दिखावा है। इसमें राजनीतिक दल जनता को सिर्फ चुनाव के समय वोट देने वाली मशीन मान लेते हैं और सत्ता हथियाने के बाद जनता को भूल जाते हैं। दलों की यह तानाशाही तानाशाही प्रवृत्तियों को जन्म देती है।

  2. संगठनहीन लोकतंत्र और पीपल्स कमेटियां (Organised Democracy & People's Committees):

    • दलीय राजनीति के विकल्प के रूप में राय ने 'पीपल्स कमेटियों' (जनता की समितियों) की स्थापना का सुझाव दिया।

    • उनके अनुसार, समाज के पुनर्गठन की शुरुआत स्थानीय स्तर (गाँवों और मोहल्लों) पर इन कमेटियों के गठन से होनी चाहिए। इन कमेटियों में स्थानीय लोग सीधे भाग लेंगे। यही समितियां शासन और सत्ता की वास्तविक आधारशिला होंगी, जिससे लोकतंत्र ऊपर से नीचे की ओर नहीं, बल्कि नीचे से ऊपर की ओर (Bottom-up approach) काम करेगा।

  3. सत्ता का विकेंद्रीकरण (Decentralization of Power):

    • राय एक ऐसे विकेंद्रीकृत समाज के पक्षधर थे जहाँ राज्य की नौकरशाही और केंद्रीय शक्ति क्षीण हो और वास्तविक सत्ता संगठित नागरिकों के हाथों में हो। इससे तानाशाही की संभावना खत्म हो जाती है।

  4. सहकारी और मानवतावादी अर्थव्यवस्था:

    • अर्थव्यवस्था का संचालन न तो बेलगाम पूँजीवाद के हाथों में होना चाहिए और न ही सर्वशक्तिमान राज्य के नियंत्रण में।

    • राय ने सहकारी उपक्रमों (Co-operatives) पर आधारित अर्थव्यवस्था की वकालत की, जहाँ उत्पादन का उद्देश्य मुनाफा कमाना न होकर समाज की मानवीय आवश्यकताओं को पूरा करना हो, और जिसमें श्रमिकों का सीधा नियंत्रण हो।

निष्कर्ष

संक्षेप में, एम० एन ० राय का 'रैडिकल ह्यूमैनिज्म' एक ऐसा वैचारिक ढांचा है जो व्यक्ति को उसकी खोई हुई गरिमा और स्वतंत्रता वापस दिलाना चाहता है। वे एक ऐसे समाज की रचना करना चाहते थे जो बल या सत्ता के जोर पर नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों के विवेक, नैतिकता और सहकारी सहयोग पर आधारित हो।

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