बदलती विश्व व्यवस्था और भारत: क्या अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बचा पाएगा नई दिल्ली?
आधुनिक भू-राजनीतिक परिदृश्य एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां स्थापित व्यवस्थाएं कमजोर पड़ रही हैं और नए समीकरण तेजी से जन्म ले रहे हैं। अमेरिका तथा चीन के मध्य बढ़ती प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन टकराव, पश्चिम एशिया के अनवरत बदलते घटनाक्रम और वैश्विक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर उठते प्रश्नों के बीच संपूर्ण विश्व एक बार फिर स्पष्ट खेमों में बंटता नजर आ रहा है।
इस मची हुई उथल-पुथल के बीच देश के नीति-निर्माताओं के समक्ष सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि क्या भारत अपनी पारंपरिक 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) को अक्षुण्ण रख पाएगा या उसे किसी विशिष्ट महाशक्ति के प्रभाव क्षेत्र में झुकना होगा?
रणनीतिक स्वायत्तता की बदलती परिभाषा और भारत की दिशा
शीत युद्ध के कालखंड में भारत ने 'गुटनिरपेक्षता' का मार्ग चुना था, जिसका मूल भाव किसी भी सैन्य गठबंधन से दूरी बनाए रखना था। आज के बहुध्रुवीय (Multipolar) परिवेश में यही दृष्टिकोण 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) के रूप में रूपांतरित हो चुका है। इसका सीधा तात्पर्य है—
- किसी एक स्थायी गुट से बंधे बिना, केवल राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर विभिन्न राष्ट्रों के साथ व्यावहारिक संबंध रखना।
- एक ओर अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र, सुरक्षा और उच्च तकनीक में सहभागिता करना, तो दूसरी ओर रूस के साथ पारंपरिक ऊर्जा आपूर्ति तथा सामरिक संबंधों को जीवित रखना।
- क्वाड (Quad) के माध्यम से समुद्री स्थिरता को साधना, और साथ ही ब्रिक्स (BRICS) व शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के मंचों पर ग्लोबल साउथ के हितों की मुखर पैरवी करना।
तथापि, क्या वर्तमान भू-राजनीतिक दबावों के बीच यह संतुलन वास्तव में टिक पा रहा है? इसे कुछ समकालीन दृष्टांतों से भली-भांति समझा जा सकता है।
रणनीतिक स्वायत्तता के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएं और समकालीन दृष्टांत
- रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिमी जगत का कूटनीतिक दबाव:जब से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ा है, पश्चिमी देशों द्वारा लगातार यह प्रयास किया जाता रहा है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाएं रूस के विरुद्ध कड़ा रुख अख्तियार करें। इसके बावजूद, नई दिल्ली ने पश्चिमी प्रतिबंधों की परवाह किए बिना अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता दी और रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात सुचारू रखा। इसके अतिरिक्त, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मॉस्को और कीव दोनों की यात्राएं कर यह स्पष्ट संदेश दिया कि यह दौर संघर्ष का नहीं है और भारत निरंतर संवाद तथा शांति का पक्षधर है।
- सीमाई चुनौतियां और हिंद महासागर में बढ़ता सामरिक तनाव:वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर बना तनाव और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती दखलंदाजी ने भारत के रणनीतिक विकल्पों को सीमित किया है। बीजिंग के साथ बने भारी व्यापारिक असंतुलन को पाटने के लिए सरकार को कई बार आर्थिक और सुरक्षात्मक कदम उठाने पड़े हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि केवल बयानों से नहीं बल्कि आर्थिक मोर्चे पर भी स्वायत्तता बचाना एक कठिन परीक्षा है।
- आपूर्ति श्रृंखला और महत्वपूर्ण खनिजों (Critical Minerals) की निर्भरता:वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और सौर ऊर्जा उपकरणों के लिए चीन पर बनी अत्यधिक निर्भरता आज भी भारत की सौदेबाजी की क्षमता को प्रभावित करती है। यद्यपि 'मेक इन इंडिया' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे अभियानों के जरिए इस खाई को पाटने का कार्य युद्धस्तर पर जारी है, फिर भी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के झटकों से पूरी तरह सुरक्षित होना अभी बाकी है।
स्वायत्तता को आधार प्रदान करने वाली भारत की आंतरिक और बाह्य ताकतें
इन तमाम अड़चनों के बावजूद, भारत की रणनीतिक स्वायत्तता महज कागजी नहीं बल्कि ठोस एवं व्यावहारिक धरातल पर आधारित है। इसके कुछ ताज़ा उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- कूटनीतिक संतुलन (क्वाड और ब्रिक्स की दोहरी सदस्यता): भारत एक तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ 'क्वाड' का मजबूत स्तंभ है, जो क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने का कार्य करता है; वहीं दूसरी ओर वह 'ब्रिक्स' और 'एससीओ' का भी सक्रिय हिस्सा है, जो पश्चिमी वित्तीय ढांचे के विकल्प तलाशते हैं। भारत ने यह बार-बार साबित किया है कि वह किसी भी मंच को किसी अन्य देश के विरोधी खेमे के रूप में इस्तेमाल नहीं होने देगा।
- ग्लोबल साउथ के सच्चे प्रवक्ता के रूप में उदय: वैश्विक मंचों पर भारत ने विकासशील देशों की खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा संकट और वित्तीय चुनौतियों को प्रमुखता से रखा है। अफ्रीकी संघ को G20 की पूर्ण सदस्यता दिलवाना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारत दुनिया के उपेक्षित और विकासशील देशों की मजबूत आवाज बनकर अपनी स्वतंत्र कूटनीतिक जमीन तैयार कर रहा है।
- रक्षा विविधीकरण (Defence Diversification): भारत ने अपने रक्षा साजो-सामान के आयात को किसी एक देश तक सीमित नहीं रखा है। जहां एक ओर फ्रांस से राफेल विमान और अमेरिका से उन्नत हेलीकॉप्टर खरीदे जा रहे हैं, वहीं रूस के साथ S-400 वायु रक्षा प्रणाली का सौदा भी जारी है। इसके साथ ही, घरेलू रक्षा उत्पादन और निर्यात में हो रही वृद्धि यह दर्शाती है कि देश रक्षा क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहा है।
निष्कर्ष: क्या नई दिल्ली बचा पाएगी अपनी स्वायत्तता?
बदलती हुई विश्व व्यवस्था के इस दौर में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर दबाव अवश्य बढ़ा है, किंतु देश ने अपनी परिपक्व कूटनीति और 'बहु-संरेखण' की नीति के बल पर इसे अपनी कमजोरी के बजाय अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में स्वायत्तता केवल तटस्थ रहने से नहीं, बल्कि आंतरिक आर्थिक, तकनीकी और सैन्य सुदृढ़ता से सुनिश्चित होती है। यदि भारत अपनी आर्थिक विकास गति को तेज रखता है, घरेलू विनिर्माण को गति देता है और तकनीकी नवाचार में आगे रहता है, तो वह नई वैश्विक व्यवस्था में बिना किसी के दबाव के अपने निर्णय स्वयं लेने में पूरी तरह सक्षम रहेगा।
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