विकास : अविकसितता और निर्भरता (Development and Underdevelopment: A Dependency Perspective)
परिचय: विकास और अविकसितता की पारंपरिक और आलोचनात्मक अवधारणा
राजनीति विज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में 'विकास' (Development) और 'अविकसितता' (Underdevelopment) केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह वैश्विक शक्ति संतुलन, ऐतिहासिक शोषक संरचनाओं और अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन के जटिल परिणाम हैं।
पारंपरिक उदारवादी दृष्टिकोण विकास को एक क्रमिक, रैखिक (Linear) प्रक्रिया मानता है, जिसके तहत अविकसित देश पश्चिमी देशों के मॉडल का अनुसरण करके विकसित हो सकते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, अविकसितता किसी समाज की अपनी आंतरिक अक्षमता, रूढ़िवादिता या पूंजी व तकनीक के अभाव का परिणाम है।
इसके विपरीत, निर्भरता सिद्धांत (Dependency Theory) इस पारंपरिक दृष्टिकोण को पूरी तरह खारिज करता है। यह तर्क देता है कि अल्पविकसितता कोई मूल या प्राकृतिक स्थिति नहीं है, बल्कि यह वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा उत्पन्न एक सुविचारित स्थिति है। विकसित देशों (केंद्र/Core) की समृद्धि और विकास सीधे तौर पर विकासशील देशों (परिधि/Periphery) के आर्थिक शोषण, संसाधनों की निकासी और असमान व्यापारिक शर्तों पर आधारित हैं।
निर्भरता सिद्धांत का सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य और मुख्य विचारक
निर्भरता सिद्धांत 1960 और 1970 के दशक में लैटिन अमेरिकी अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा विकसित किया गया, जो पारंपरिक आधुनिकीकरण सिद्धांतों की विफलताओं से असंतुष्ट थे।
1. रैउल प्रेबिश (Raúl Prebisch) और ईसीएलएसी (ECLAC) मॉडल
लैटिन अमेरिकी अर्थशास्त्री रैउल प्रेबिश ने रेखांकित किया कि वैश्विक व्यापार प्रणाली में 'केंद्र' (औद्योगिक राष्ट्र) और 'परिधि' (प्राथमिक वस्तुएं उत्पादक देश) के बीच व्यापार की शर्तें (Terms of Trade) लगातार परिधि के प्रतिकूल होती जा रही हैं। परिधि के देश सस्ते कच्चे माल का निर्यात करते हैं और महंगे विनिर्मित उत्पाद आयात करते हैं, जिससे मूल्य का निरंतर हस्तांतरण केंद्र की ओर होता है।
2. आंद्रे गुन्टर फ्रैंक (André Gunder Frank): अल्पविकसितता का विकास
आंद्रे गुन्टर फ्रैंक ने अपने प्रसिद्ध सिद्धांत "अल्पविकसितता का विकास" (Development of Underdevelopment) में यह प्रतिपादित किया कि आज के अविकसित देश कभी 'अविकसित' थे, लेकिन वे कभी 'आदिम' या 'पिछड़े' नहीं थे। वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था ने उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के माध्यम से उनकी स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को इस प्रकार विकृत किया कि वे स्थायी रूप से आश्रित हो गए। फ्रैंक के अनुसार, महानगरीय केंद्र (Metropolis) और उपग्रह (Satellite) की एक लंबी श्रृंखला होती है, जिसमें अधिशेष (Surplus) हमेशा स्थानीय उपग्रह से राष्ट्रीय महानगर और वहां से अंतरराष्ट्रीय महानगर की ओर बहता है।
3. फर्नांडो एनरिक कार्डोसो औरिएन्ज़ो फालेट्टो: एसोसिएटेड डिपेंडेंसी
इन विचारकों ने यह दर्शाया कि निर्भरता पूरी तरह स्थिर नहीं है। बहुराष्ट्रीय निगमों (MNCs) के प्रवेश के साथ परिधि के देशों में कुछ औद्योगिक विकास तो होता है, लेकिन यह एक "सम्बद्ध निर्भरता" (Associated-Dependent Development) होती है, जहां निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति बाहरी ताकतों और वैश्विक पूंजी के हाथों में होती है।
कोर (केंद्र) और पेरिफेरी (परिधि) की गतिकी: निर्भरता के तंत्र
वैश्विक पूंजीवादी व्यवस्था में निर्भरता बनाए रखने के लिए विभिन्न आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तंत्र कार्य करते हैं:
- असममित व्यापार (Unequal Exchange): कच्चे माल का कम मूल्य और उच्च तकनीक वाले उत्पादों का अत्यधिक मूल्य निर्धारण।
- प्रौद्योगिकी एकाधिकार (Technological Monopoly): अनुसंधान और विकास (R&D) पर विकसित देशों का नियंत्रण, जिससे विकासशील देश हमेशा रॉयल्टी और पेटेंट के लिए आश्रित रहते हैं।
- वित्तीय नियंत्रण: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों (SAP) के माध्यम से विकासशील देशों की आर्थिक नीतियों को प्रभावित करती हैं।
- सांस्कृतिक साम्राज्यवाद: मीडिया, उपभोक्तावाद और पश्चिमी जीवनशैली के प्रसार के माध्यम से स्थानीय संस्कृतियों और आत्मनिर्भर मानसिकता का क्षरण।
समकालीन संदर्भ में प्रासंगिकता: वैश्वीकरण और नव-उदारवाद
आज के वैश्वीकृत युग में, जहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) और ग्लोबल सप्लाई चेन का बोलबाला है, निर्भरता का स्वरूप बदला है लेकिन उसका मूल चरित्र यथावत है।
- ऋण संकट और नव-औपनिवेशिक नियंत्रण: विकासशील देशों पर बढ़ता विदेशी कर्ज उन्हें वैश्विक वित्तीय संस्थानों के निर्देशों के आगे झुकने के लिए मजबूर करता है।
- असमान डिजिटल और ज्ञान अर्थव्यवस्था: डेटा संप्रभुता और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में तकनीकी रूप से उन्नत राष्ट्र ही वैश्विक नियमों को तय कर रहे हैं, जिससे दक्षिण के देश फिर से हाशिए पर जा रहे हैं।
- पर्यावरणीय असमानता: जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में 'साझा पर विभेदित उत्तरदायित्व' (CBDR) के सिद्धांतों के बावजूद, संसाधनों का दोहन और पर्यावरणीय लागत मुख्य रूप से विकासशील देशों को उठानी पड़ रही है।
निष्कर्ष
विकास और अविकसितता का यह द्वंद्व केवल अर्थशास्त्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह न्याय, सत्ता और संप्रभुता का एक विराट राजनीतिक प्रश्न है। जब तक वैश्विक आर्थिक ढांचे में संरचनात्मक सुधार नहीं होते, और परिधि के देश सामूहिक सौदेबाजी (Collective Bargaining), दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) और आत्मनिर्भरता (Self-reliance) को मजबूत नहीं करते, तब तक औपचारिक राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद आर्थिक निर्भरता की यह श्रृंखला बनी रहेगी। सच्ची स्वतंत्रता और समग्र विकास तभी संभव है जब वैश्विक व्यवस्था न्यायपूर्ण, बहुध्रुवीय और समतावादी मूल्यों पर आधारित हो।
Comments
Post a Comment