भारतीय लोकतंत्र में पहचान की राजनीति बनाम विकासवादी एजेंडा: एक राजनीतिक द्वंद्व (वर्तमान संदर्भ सहित )
परिचय
भारतीय लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक बहुलतावादी लोकतंत्र है। स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय राजनीति की धुरी सामाजिक विविधता और कल्याणकारी आकांक्षाओं के इर्द-गिर्द घूमती रही है। जैसे-जैसे भारतीय मतदाता परिपक्व हुआ है, यहाँ चुनावी बहसों के केंद्र में दो प्रमुख धाराएँ स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई हैं—पहचान की राजनीति (Identity Politics) और विकासवादी एजेंडा (Developmental Agenda)।
जहाँ एक ओर पहचान की राजनीति धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर नागरिकों को एकजुट करती है और हाशिए के समूहों को राजनीतिक मुखरता प्रदान करती है, वहीं दूसरी ओर विकासवादी एजेंडा शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा, रोजगार और आर्थिक समृद्धि जैसे भौतिक मुद्दों पर केंद्रित होता है। आज के समय में इन दोनों प्रवृत्तियों के बीच का अंतर्संबंध, टकराव और उनका समकालीन स्वरूप भारतीय लोकतंत्र की दिशा को तय कर रहा है।
पहचान की राजनीति: उद्भव, स्वरूप और आवश्यकता
भारत जैसी बहु-सांस्कृतिक और पदानुक्रमित (Hierarchical) समाज व्यवस्था में पहचान की राजनीति का उदय एक ऐतिहासिक अनिवार्यता था। सदियों से जाति व्यवस्था, सामाजिक भेदभाव और सांस्कृतिक दमन का शिकार रहे समुदायों के लिए अपनी पहचान के आधार पर गोलबंद होना राजनीतिक अधिकार पाने का सबसे प्रभावी साधन बना।
1. सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण का साधन
- जाति और क्षेत्र की राजनीति: मंडल आयोग के बाद भारत में पिछड़ी जातियों और दलितों की राजनीतिक भागीदारी में भारी वृद्धि हुई। इसने हाशिए के वर्गों को सत्ता के गलियारों में आवाज दी और लोकतंत्र को समावेशी बनाया।
- अस्मिता और अधिकार: भाषाई राज्यों का गठन इस बात का प्रमाण है कि सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का सम्मान किए बिना राष्ट्रीय एकता को मजबूत नहीं किया जा सकता।
2. पहचान की राजनीति की सीमाएँ
- ध्रुवीकरण और सामाजिक विखंडन: जब पहचान की राजनीति संकुचित स्वार्थों या आक्रामक बहुसंख्यकवाद/अल्पसंख्यकवाद का रूप ले लेती है, तो यह समाज में ध्रुवीकरण और अविश्वास पैदा करती है।
- मूलभूत मुद्दों से भटकाव: कई बार पहचान के भावनात्मक मुद्दे रोजगार, गरीबी और स्वास्थ्य जैसे वास्तविक विकासपरक मुद्दों को पीछे धकेल देते हैं।
विकासवादी एजेंडा: नई राजनीतिक संस्कृति का उभार
पिछले कुछ दशकों में, विशेषकर उदारीकरण के बाद और हालिया राजनीतिक दौर में, भारतीय मतदाताओं की प्राथमिकताओं में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। अब केवल पहचान या भावनात्मक नारे चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं रहे, बल्कि 'विकास' (Development), 'सुशासन' (Good Governance) और कल्याणकारी नीतियाँ एक केंद्रीय मुद्रा बन चुके हैं।
वर्तमान उदाहरण और समकालीन परिप्रेक्ष्य (Contemporary Context)
वर्तमान भारतीय राजनीति में पहचान की राजनीति और विकासवादी एजेंडा एक-दूसरे के विपरीत खड़े होने के बजाय आपस में इस तरह घुल-मिल गए हैं कि एक नई 'संकर राजनीति' (Hybrid Politics) का जन्म हुआ है। इसे निम्नलिखित वर्तमान उदाहरणों से समझा जा सकता है:
1. 'लाभार्थी वर्ग' (Beneficiary Class) का उदय: पहचान और विकास का समन्वय
- वर्तमान संदर्भ: हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में एक नए वर्ग—'लाभार्थी वर्ग'—का उभार हुआ है। इसमें जाति, धर्म और क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को शामिल किया गया है जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारों की प्रत्यक्ष योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन योजना, आयुष्मान भारत और नल से जल) का सीधा लाभ मिला है।
- विश्लेषण: यहाँ राजनीतिक दल पहचान की राजनीति (जैसे जातियों या समुदायों का समीकरण साधना) को पूरी तरह छोड़ते नहीं हैं, बल्कि उसके साथ 'विकास और कल्याणकारी योजनाओं' (Developmentalism) को जोड़कर एक नया चुनावी समीकरण बनाते हैं। अब मतदाता केवल जाति के नाम पर वोट देने के साथ-साथ यह भी देखता है कि उसे विकास योजनाओं का कितना लाभ मिला है।
2. जातियों की नई माँग: अस्मिता से लेकर आर्थिक-सामाजिक हिस्सेदारी तक
- वर्तमान संदर्भ: देश के विभिन्न राज्यों में जातिगत जनगणना (Caste Census) की माँग और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (EWS) या आरक्षण के दायरे को बढ़ाने की चल रही बहस इस बात का प्रमाण है कि आज की पहचान की राजनीति केवल भावनात्मक नहीं रही, बल्कि यह संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और विकास में हिस्सेदारी (Resource Distribution) से जुड़ गई है।
- वर्तमान उदाहरण: बिहार और अन्य राज्यों में जाति आधारित सर्वे के आंकड़े सामने आने के बाद राजनीतिक दलों द्वारा "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी" का नारा दिया गया। यह पहचान की राजनीति का एक ऐसा आधुनिक रूप है जो सीधे तौर पर विकास और नीतिगत लाभों से जुड़ा हुआ है।
3. भौतिक बुनियादी ढांचा (Infra-Politics) और डिजिटल पहचान
- वर्तमान संदर्भ: आज राजनीति में एक्सप्रेसवे, वंदे भारत ट्रेनें, डिजिटल भुगतान (UPI) और सेमीकंडक्टर निर्माण जैसे विकास के प्रतीक चिन्ह एक राजनीतिक विमर्श बन चुके हैं। सरकारें अपनी उपलब्धियों को राष्ट्रीय गौरव और विकास की पहचान के रूप में पेश करती हैं।
- विश्लेषण: यहाँ 'विकास' स्वंय में एक राजनीतिक पहचान (Developmental Identity) का रूप ले चुका है, जहाँ पार्टियाँ 'सुशासन और विकास' के मॉडल पर वोट मांगती हैं।
पहचान बनाम विकास: क्या यह परस्पर विरोधी है या पूरक?
राजनीति विज्ञान के विश्लेषकों के अनुसार, पहचान की राजनीति और विकासवादी एजेंडा को एक-दूसरे के विरोधी के रूप में देखने के बजाय एक जटिल अंतर्संबंध के रूप में देखा जाना चाहिए।
- पहचान के बिना विकास अधूरा: जब तक समाज के शोषित और वंचित वर्गों को उनकी सामाजिक पहचान के आधार पर गरिमा और न्याय नहीं मिलता, तब तक सामान्य विकास का लाभ उन तक पूरी तरह नहीं पहुँच सकता। अतः सामाजिक न्याय विकास की पहली शर्त है।
- विकास के बिना पहचान अर्थहीन: केवल पहचान की राजनीति करने से गरीबों की भूख या बेरोजगारी दूर नहीं हो सकती। अंततः हर नागरिक को अपनी आजीविका और बेहतर जीवन स्तर के लिए विकासवादी एजेंडे की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
भारतीय लोकतंत्र की असली खूबसूरती इसी बात में निहित है कि यह पहचान की गरिमा और विकास की अनिवार्यता—दोनों को एक साथ साधने का प्रयास करता है। आज की राजनीति में पहचान और विकास अब दो अलग-अलग रास्ते नहीं रहे, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।
एक परिपक्व लोकतंत्र के रूप में भारत को ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जो भावनात्मक ध्रुवीकरण से ऊपर उठकर समावेशी विकास (Inclusive Development) और सामाजिक न्याय के दोहरे इंजन पर चले। जब तक नागरिकों की गरिमा (पहचान) और उनकी बुनियादी जरूरतें (विकास) दोनों सुरक्षित नहीं होतीं, तब तक भारतीय लोकतंत्र का यह सफर अधूरा रहेगा।
Comments
Post a Comment