वैश्विक दक्षिण और भारतीय कूटनीति: उभरते वैश्विक परिदृश्य का नया केंद्र
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बदलते कैनवास पर 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की मुखरता अब एक अकाट्य वास्तविकता बन चुकी है। विकासशील, अल्पविकसित और नव-उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों का यह विशाल समूह पश्चिमी ताकतों के लंबे समय से चले आ रहे एकाधिकार को चुनौती दे रहा है। इस ऐतिहासिक भू-राजनीतिक बदलाव के केंद्र बिंदु में भारत की सक्रिय, संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति मजबूती से स्थापित है। भारत न केवल विकासशील देशों के हितों का सबसे बड़ा पुरोधा बनकर सामने आया है, बल्कि उसने ग्लोबल नॉर्थ (विकसित देशों) और ग्लोबल साउथ के बीच एक विश्वसनीय सेतु का कार्य भी किया है।
1. ग्लोबल साउथ की अवधारणा और इसकी समकालीन प्रासंगिकता
पारंपरिक रूप से शीत युद्ध के दौर में इन देशों को 'तीसरी दुनिया' के रूप में देखा जाता था, जिनकी वैश्विक मंचों पर नीति-निर्माण में कोई खास हिस्सेदारी नहीं होती थी। परंतु 21वीं सदी के इस दौर में यह परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। आज ग्लोबल साउथ दुनिया की बहुसंख्यक आबादी, अपार प्राकृतिक संपदा और तीव्र आर्थिक विकास गति का प्रतिनिधित्व करता है।
इसके बावजूद, कोविड-19 महामारी, भू-राजनीतिक टकराव, खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा के गहरे संकट तथा जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों ने यह उजागर कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे पुराने संस्थान आज की वैश्विक वास्तविकताओं के अनुकूल नहीं हैं। इन बहुपक्षीय मंचों में आमूल-चूल सुधार की पुरजोर मांग ही आज इस समूह की एकजुटता का मुख्य आधार है।
2. भारतीय कूटनीति के बदलते आयाम: सहयोगात्मक दृष्टिकोण
भारत की कूटनीतिक परंपरा हमेशा से रणनीतिक स्वायत्तता और 'वसुधैव कुटुंबकम' (समस्त विश्व एक परिवार है) के दर्शन पर टिकी रही है। हाल के वर्षों में भारतीय विदेश नीति ने ग्लोबल साउथ के सरोकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। इस दिशा में भारत के प्रयास निम्नलिखित स्तंभों पर आधारित हैं:
- वंचितों की प्रभावी आवाज बनना: भारत ने बहुपक्षीय मंचों पर लगातार उन राष्ट्रों के हितों की पैरवी की है जिन्हें वैश्विक नीतियों के निर्धारण के दौरान अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
- साझा विकास मॉडल का प्रसार: भारत ने अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI, आधार, और डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफॉर्म), अंतरिक्ष विज्ञान के लाभ (ISRO के माध्यम से उपग्रह सेवाएँ) तथा किफायती स्वास्थ्य व वैक्सीन आपूर्ति को विकासशील देशों के साथ उदारतापूर्वक साझा किया है।
- रणनीतिक स्वतंत्रता: वैश्विक ध्रुवीकरण और महाशक्तियों के बीच तनाव के दौर में भी भारत ने अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रखते हुए ग्लोबल साउथ के हितों को आंच नहीं आने दी है।
3. जी-20 शिखर सम्मेलन 2023: मील का पत्थर
भारत की इस कूटनीति का सबसे प्रभावी और ऐतिहासिक प्रदर्शन वर्ष 2023 की जी-20 (G20) की अध्यक्षता के दौरान देखने को मिला। भारत ने अपनी अध्यक्षता का मूलमंत्र 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' तय करते हुए विकासशील दुनिया की प्राथमिकताओं को वैश्विक एजेंडे के केंद्र में ला खड़ा किया।
- अफ्रीकी संघ को पूर्ण सदस्यता: भारत के विशेष प्रयासों से 55 देशों के प्रभावशाली समूह 'अफ्रीकी संघ' को जी-20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। दशकों से वैश्विक मंचों पर हाशिए पर रहे अफ्रीकी महाद्वीप को निर्णय-प्रक्रिया के शीर्ष पर पहुँचाने का यह एक ऐतिहासिक निर्णय था।
- वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन: भारत ने वैश्विक बैठकों से पहले विशेष आयोजनों के जरिए 125 से अधिक विकासशील देशों के शीर्ष नेतृत्व से सीधा संवाद किया, जिससे उनकी जमीनी जरूरतों और आकांक्षाओं को सीधे वैश्विक मंच की नीतियों में जगह मिली।
4. ताजा वैश्विक परिप्रेक्ष्य और व्यावहारिक उदाहरण
आज भारत की यह कूटनीति केवल कागजी वादों तक सीमित न रहकर ठोस और व्यावहारिक धरातल पर क्रियान्वित हो रही है:
- 'ग्लोबल डेवलपमेंट कॉम्पैक्ट' की पहल: भारत सरकार द्वारा व्यापार विस्तार, क्षमता निर्माण, तकनीकी हस्तांतरण और रियायी वित्तपोषण के क्षेत्र में दक्षिण-दक्षिण सहयोग को गति देने के लिए एक व्यापक विकास कॉम्पैक्ट का खाका प्रस्तुत किया गया है।
- संस्थानिक और उच्च-स्तरीय जुड़ाव: अफ्रीकी और कैरेबियन देशों के साथ भारत का राजनयिक संवाद लगातार प्रगाढ़ हुआ है। भारत में स्थापित DAKSHIN (Global South Centre for Excellence) संस्थान विकासशील देशों के प्रशासनिक व तकनीकी युवाओं के कौशल विकास और प्रशिक्षण में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
- संकट काल में प्राथमिक मददगार ('First Responder'): हिंद महासागर क्षेत्र से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप तक, प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय संकटों या स्वास्थ्य आपात स्थितियों के समय भारत ने सदैव सबसे पहले पहुंचकर सहायता पहुंचाई है, जिससे ग्लोबल साउथ के देशों के बीच भारत की साख अत्यंत मजबूत हुई है।
5. मार्ग में आने वाली चुनौतियां और रणनीतिक समाधान
इस नेतृत्व की भूमिका को निभाते हुए भारत के सामने कुछ जटिल भू-राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियां भी हैं:
- गंभीर ऋण संकट: कई विकासशील देश भारी-भरकम विदेशी कर्ज और मुद्रास्फीति के जाल में फंसे हैं। भारत ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के समक्ष इन देशों के लिए लचीली और पुनर्निर्धारित ऋण नीतियों की मांग पुरजोर तरीके से उठाई है।
- जलवायु न्याय की लड़ाई: ऐतिहासिक रूप से न्यूनतम प्रदूषण करने वाले विकासशील देशों पर कार्बन उत्सर्जन घटाने का अनुचित दबाव डाला जाता है। भारत ने 'कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पांसबिलिटीज' (CBDR) के सिद्धांत के तहत विकसित देशों से पर्याप्त जलवायु वित्तपोषण और हरित तकनीक के मुफ्त या सस्ते हस्तांतरण की मांग की है।
- महाशक्तियों की स्पर्धा: इंडो-पैसिफिक और वैश्विक स्तर पर चल रही तीव्र शक्ति-संतुलन की खींचतान के बीच भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि ग्लोबल साउथ का कोई भी देश किसी एकतरफा दबाव के आगे न झुके, बल्कि बहुध्रुवीय व्यवस्था मजबूत हो।
6. निष्कर्ष
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना अब भारत के लिए केवल एक राजनयिक विकल्प नहीं, बल्कि उसका नैतिक और ऐतिहासिक उत्तरदायित्व बन चुका है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह विश्वास दिलाया है कि वह केवल अपनी राष्ट्रीय समृद्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी विकासशील मानवता की आवाज बनने का सामर्थ्य रखता है।
जैसे-जैसे विश्व व्यवस्था बहुध्रुवीय होती जा रही है, भारत की यह समावेशी, संतुलित और न्यायसंगत कूटनीति वैश्विक शांति और सतत विकास के लिए एक नई उम्मीद की किरण बनकर चमक रही है। आने वाले समय में ग्लोबल साउथ की एकजुटता वैश्विक राजनीति के शक्ति समीकरणों को नए सिरे से गढ़ने की पूरी ताकत रखती है।
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