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वैश्वीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वर्तमान कार्यशैली


वैश्वीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वर्तमान कार्यशैली और इक्कीसवीं सदी की राजनीतिक-आर्थिक चुनौतियाँ

प्रस्तावना: भूमंडलीकरण का बदलता परिदृश्य

बीसवीं सदी के अंतिम दशकों में सोवियत संघ के विघटन और उदारीकरण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण (LPG Policies) के प्रसार के साथ जिस 'वैश्वीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था' (Globalized Political Economy) का उदय हुआ था, उसने दुनिया को एक 'ग्लोबल विलेज' में बदल दिया था। पूंजी, प्रौद्योगिकी और श्रम का निर्बाध प्रवाह इसका मुख्य आधार था।

लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में प्रवेश करते-करते यह व्यवस्था एक गंभीर वैचारिक और संरचनात्मक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। वर्तमान में भू-राजनीतिक संघर्षों, महाशक्तियों के बीच व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता और महामारी के प्रभावों ने इसकी कार्यशैली को पूरी तरह से बदल दिया है।

1. वैश्वीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वर्तमान कार्यशैली: संरचना और तंत्र

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल कागजी व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके संचालन के पीछे कई जटिल तंत्र काम कर रहे हैं:

क. डिजिटल प्लेटफॉर्म और डेटा का वैश्वीकरण (Digital & Data-driven Globalization)

पारंपरिक वस्तुओं के व्यापार के साथ-साथ आज 'डेटा' सबसे बड़ी वैश्विक मुद्रा बन गया है।

  • उदाहरण: Google, Apple, Microsoft, Amazon और Meta जैसी तकनीकी दिग्गज कंपनियाँ (Big Tech) सीमाओं से परे संपूर्ण वैश्विक अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करती हैं। इनकी कार्यशैली यह है कि ये क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने से आर्थिक गतिविधियों का संचालन और नियमन करती हैं।

ख. वैश्विक मूल्य शृंखलाएँ (Global Value Chains - GVCs)

आज कोई भी उत्पाद एक देश में नहीं बनता। इसके विभिन्न हिस्से अलग-अलग देशों में बनते हैं।

  • उदाहरण: ऐप्पल का आईफोन (Apple iPhone) इस बात का सबसे सटीक उदाहरण है। इसका डिज़ाइन अमेरिका में बनता है, इसके माइक्रोचिप ताइवान या दक्षिण कोरिया में तैयार होते हैं, स्क्रीन दक्षिण कोरिया या जापान से आती है, और इसकी अंतिम असेंबली चीन या भारत में होती है। यह वर्तमान वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था की पारस्परिकता (Interdependence) को दर्शाता है।

ग. बहुपक्षीय संस्थानों की भूमिका और सीमाएँ

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक (World Bank) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) वैश्विक वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए नीतियां बनाते हैं, हालांकि वर्तमान में विकासशील देशों और विकसित देशों के हितों के टकराव के कारण इनकी कार्यक्षमता पर प्रश्नचिह्न भी लगे हैं।

2. इक्कीसवीं सदी की प्रमुख राजनीतिक-आर्थिक चुनौतियाँ और प्रासंगिक उदाहरण

वर्तमान सदी में वैश्वीकृत अर्थव्यवस्था के सामने कई ऐसी जटिल चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं, जिन्होंने इसके स्थायित्व को हिलाकर रख दिया है:

क. आर्थिक राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद और भू-राजनीतिक टकराव (Protectionism & Geopolitics)

मुक्त व्यापार (Free Trade) का दौर अब पीछे छूट रहा है और देश 'आर्थिक राष्ट्रवाद' की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए टैरिफ और प्रतिबंधों का खुलकर उपयोग हो रहा है।

  • उदाहरण: अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर (US-China Trade War)। अमेरिका द्वारा चीनी सामानों और खासकर सेमीकंडक्टर चिप्स पर कड़े प्रतिबंध लगाना और चीन द्वारा अपने दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) के निर्यात पर नियंत्रण कसना इस बात का प्रमाण है कि व्यापार अब केवल कूटनीति का हथियार बन गया है।

ख. आपूर्ति श्रृंखला का विखंडन: 'नियर-शोरिंग' और 'फ्रेंड-शोरिंग'

कोविड-19 महामारी के दौरान जब लॉकडाउन लगे, तो पूरी दुनिया की आपूर्ति श्रृंखला ठप हो गई। इसके बाद से देशों ने चीन पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करना शुरू कर दिया है।

  • उदाहरण: वैश्विक कंपनियाँ अब 'चाइना प्लस वन' (China Plus One) रणनीति अपना रही हैं। इसके तहत वे अपने उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा भारत, वियतनाम और मैक्सिको जैसे देशों में स्थानांतरित कर रही हैं। इसी तरह, पश्चिमी देश अब केवल मित्र देशों से व्यापार करने की नीति यानी 'फ्रेंड-शोरिंग' (Friend-shoring) पर जोर दे रहे हैं।

ग. गहरी होती आर्थिक असमानता और 'पिकेटी मॉडल' का संकट

वैश्वीकरण ने वैश्विक स्तर पर कुल धन में वृद्धि तो की है, लेकिन इसका वितरण बेहद विकृत रहा है।

  • उदाहरण: ऑक्सफैम (Oxfam) की रिपोर्टें लगातार यह उजागर करती हैं कि दुनिया की आधी से अधिक संपत्ति कुछ मुट्ठी भर अरबपतियों के हाथ में सिमट चुकी है। कोविड महामारी के दौरान जहाँ आम जनता की नौकरियाँ गईं, वहीं दुनिया के शीर्ष अरबपतियों की संपत्ति में रिकॉर्ड उछाल आया, जिससे समाज में 'क्रॉनी कैपिटलिज्म' और असंतोष बढ़ा है।

घ. जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट और 'हरित संक्रमण' (Green Transition) की चुनौती

अनियंत्रित औद्योगिक विकास के कारण जलवायु परिवर्तन ने विकराल रूप ले लिया है। अब अर्थव्यवस्था के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ विकास को बनाए रखना और दूसरी तरफ पर्यावरण को बचाना।

  • उदाहरण: रूस-यूक्रेन युद्ध (2022) के बाद उपजा ऊर्जा संकट। जब रूस से प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित हुई, तो यूरोपीय देशों को मजबूरन कुछ समय के लिए फिर से कोयले पर आधारित ऊर्जा की ओर लौटना पड़ा। यह घटना दिखाती है कि कैसे भू-राजनीतिक उथल-पुथल हरित ऊर्जा (Green Energy) के लक्ष्यों को पटरी से उतार सकती है।

3. निष्कर्ष: समावेशी और टिकाऊ भूमंडलीकरण की ओर

वैश्वीकृत राजनीतिक अर्थव्यवस्था का यह दौर अंत का नहीं, बल्कि रूपांतरण (Transformation) का है। अंधाधुंध बाज़ारवाद (Hyper-globalization) की नीतियाँ अब प्रासंगिक नहीं रह गई हैं।

भविष्य की अर्थव्यवस्था इस बात पर निर्भर करेगी कि देश कितनी कुशलता से 'आर्थिक सुरक्षा' और 'खुले सहयोग' के बीच संतुलन बनाते हैं। भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह समय वैश्विक मंच पर अपनी विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत करने (जैसे 'मेक इन इंडिया' और पीएलआई योजनाएँ) के साथ-साथ सामाजिक समावेशिता को प्राथमिकता देने का है। सच्ची सफलता उसी व्यवस्था को मिलेगी जो मुनाफे के साथ-साथ मानवता और पर्यावरण के सह-अस्तित्व को सुनिश्चित कर सके।

मुख्य विचार: "इक्कीसवीं सदी की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को जीवित रहने के लिए केवल 'बाज़ार की दक्षता' पर नहीं, बल्कि 'मानव-केंद्रित लचीलेपन' और 'न्यायसंगत वितरण' पर जोर देना होगा।"

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