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विश्व राष्ट्रवाद

विश्व राष्ट्रवाद का पुनरुत्थान: 21वीं सदी का नया राजनीतिक सत्य 

1990 के दशक में शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, कई राजनीतिक विचारकों ने यह मान लिया था कि दुनिया अब हमेशा के लिए बदल गई है। इसे 'इतिहास का अंत' (End of History) कहा गया, जहां ऐसा लगा कि उदारवादी लोकतंत्र, भूमंडलीकरण (Globalization), मुक्त व्यापार और खुली सीमाएं ही भविष्य का एकमात्र रास्ता हैं। इंटरनेट की शुरुआत ने इस विचार को और मजबूत किया कि दुनिया अब एक 'वैश्विक गांव' (Global Village) बन चुकी है।

लेकिन, पिछले एक से डेढ़ दशक में वैश्विक राजनीति के पहिये ने उल्टा घूमना शुरू कर दिया है। आज अमेरिका से लेकर यूरोप, एशिया और लैटिन अमेरिका तक—"राष्ट्र प्रथम" (Nation First) की नीतियां फिर से वैश्विक मंच के केंद्र में आ गई हैं। यह नया राष्ट्रवाद 20वीं सदी के साम्राज्यवादी राष्ट्रवाद से अलग है; यह मुख्य रूप से संरक्षणवादी (Protectionist), पहचान-आधारित और आत्म-रक्षा से प्रेरित है।

भाग 1: राष्ट्रवाद के फिर से सिर उठाने के मूल कारण

वैश्वीकरण से पीछे हटने और राष्ट्रवाद की ओर मुड़ने के पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह कई दशकों की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल का परिणाम है।

1. वैश्वीकरण के असमान लाभ और बढ़ता आर्थिक असंतोष

वैश्वीकरण ने वैश्विक स्तर पर (विशेषकर विकासशील देशों में) करोड़ों लोगों को गरीबी से निकाला, लेकिन इसने विकसित देशों के मजदूर और मध्यम वर्ग को भारी नुकसान पहुंचाया।

  • उद्योगों का पलायन: अमेरिका और यूरोप की फैक्ट्रियां बंद हो गईं और उत्पादन चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे सस्ते श्रम वाले देशों में चला गया।
  • आर्थिक असुरक्षा: जिन लोगों की नौकरियां गईं, उन्हें लगा कि उनके अपने नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार संधियों (जैसे NAFTA या WTO) के लिए उनके हितों की बलि चढ़ा दी है। इसी आर्थिक असुरक्षा ने आम जनता के मन में यह भाव पैदा किया कि "पहले अपने देश की अर्थव्यवस्था को बचाओ।"

2. सांस्कृतिक पहचान का संकट और आप्रवासन (Immigration)

बड़े पैमाने पर होने वाले प्रवासन और शरणार्थी संकट ने दुनिया भर के कई समाजों में जनसांख्यिकीय बदलाव किए हैं।

  • यूरोप का शरणार्थी संकट: 2015 में मध्य पूर्व और अफ्रीका से लाखों शरणार्थियों के यूरोप पहुंचने के बाद, स्थानीय आबादी के एक बड़े हिस्से में यह डर पैदा हो गया कि उनकी मूल संस्कृति, भाषा, और जीवनशैली खतरे में है।
  • पहचान की राजनीति (Identity Politics): जब भी किसी समाज में तेजी से सांस्कृतिक बदलाव होते हैं, तो वहां की बहुसंख्यक आबादी असुरक्षित महसूस करने लगती है। इसी 'पहचान के संकट' ने दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी विचारधाराओं को फिर से जीवित कर दिया।

3. लोकलुभावन (Populist) नेताओं और 'एलीट-विरोधी' लहर का उदय

आज के राष्ट्रवादी उभार का एक बड़ा कारण वे नेता हैं, जिन्होंने जनता की इस असुरक्षा को पहचाना।

  • इन नेताओं ने एक स्पष्ट नैरेटिव सेट किया: "भ्रष्ट वैश्विक अभिजात वर्ग (Global Elite) बनाम आम देशभक्त नागरिक।"
  • उन्होंने जनता को समझाया कि दावोस (Davos) में बैठने वाले अरबपति और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी उनके भले के लिए काम नहीं कर रहे हैं। इन नेताओं ने अंतरराष्ट्रीय संधियों को फाड़ने और सीमाओं पर दीवारें बनाने के आसान, लेकिन जनता को आकर्षित करने वाले समाधान पेश किए।

4. कोविड-19 महामारी: वैश्वीकरण की कमजोरी का पर्दाफाश

महामारी ने राष्ट्रवाद की आग में घी का काम किया। जब कोविड-19 फैला, तो देशों ने देखा कि उनके पास बुनियादी पेरासिटामोल दवा, मास्क और वेंटिलेटर तक बनाने की क्षमता नहीं है, क्योंकि वे इसके लिए चीन पर निर्भर थे।

  • वैक्सीन राष्ट्रवाद: संकट के समय दुनिया ने देखा कि कैसे देशों ने सबसे पहले अपनी आबादी के लिए वैक्सीन जमा की।
  • सप्लाई चेन का टूटना: इस घटना ने सरकारों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उद्योगों (जैसे फार्मा और सेमीकंडक्टर) का स्वदेशी होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

5. सुरक्षा चिंताएं और भू-राजनीतिक तनाव

रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन के आक्रामक उदय ने दुनिया को फिर से याद दिलाया है कि सैन्य सुरक्षा अभी भी सबसे महत्वपूर्ण है। जब राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में होती है, तो राष्ट्रवाद स्वाभाविक रूप से बढ़ता है। अब देश एक-दूसरे पर भरोसा करने के बजाय अपनी सेनाओं को मजबूत कर रहे हैं।

भाग 2: दुनिया भर में राष्ट्रवाद के प्रमुख उदाहरण (Case Studies)

राष्ट्रवाद की यह लहर किसी एक महाद्वीप तक सीमित नहीं है। इसके स्वरूप हर जगह अलग हैं:

  • अमेरिका (America First): डोनाल्ड ट्रम्प का "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन" (MAGA) अभियान आधुनिक राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा उदाहरण था। उन्होंने ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप (TPP) से अमेरिका को बाहर निकाला और पेरिस जलवायु समझौते से हटने (अस्थायी रूप से) का फैसला किया। जो बाइडेन प्रशासन ने भी इस आर्थिक राष्ट्रवाद को जारी रखा है, विशेषकर चीन पर कड़े प्रतिबंध लगाकर और 'बाय अमेरिकन' (Buy American) नीतियों को बढ़ावा देकर।
  • यूरोप (ब्रेक्जिट और दक्षिणपंथ का उदय): ब्रिटेन का यूरोपीय संघ (EU) से बाहर निकलना (Brexit) राष्ट्रीय संप्रभुता को वापस पाने की एक बड़ी राष्ट्रवादी घटना थी। आज इटली, स्वीडन, फ्रांस, हंगरी और नीदरलैंड जैसे देशों में धुर-दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी पार्टियां या तो सत्ता में हैं या मुख्य विपक्षी दल बन चुकी हैं।
  • एशिया (आर्थिक और सभ्यतागत राष्ट्रवाद):
    • चीन: शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन में एक बेहद आक्रामक 'हान राष्ट्रवाद' पनप रहा है, जो चीन को विश्व की सबसे बड़ी शक्ति बनाने के ऐतिहासिक अधिकार पर जोर देता है।
    • भारत: भारत में सांस्कृतिक और सभ्यतागत गौरव पर जोर दिया जा रहा है। साथ ही 'आत्मनिर्भर भारत' (Self-reliant India) अभियान के जरिए आर्थिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि आयात पर निर्भरता कम हो।
    • जापान और जर्मनी: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से शांतिवादी रहे ये देश भी अब बदलते राष्ट्रवादी माहौल और सुरक्षा खतरों को देखते हुए अपने रक्षा बजट में ऐतिहासिक वृद्धि कर रहे हैं।

मुख्य विचार: "राष्ट्रवाद का नया रूप विस्तारवादी नहीं है (वे दूसरे देशों की जमीन नहीं चाहते), बल्कि यह अपनी सीमाओं को सील करने, अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने और अपनी खोई हुई सांस्कृतिक पहचान को फिर से स्थापित करने की एक गहरी लालसा है।"

भाग 3: वैश्विक व्यवस्था पर इसके गहरे प्रभाव

राष्ट्रवाद के इस पुनरुत्थान ने 21वीं सदी की दुनिया के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है:

1. डी-ग्लोबलाइजेशन (De-globalization) और फ्रेंड-शोरिंग

मुक्त व्यापार (Free Trade) का स्वर्णिम युग अब खत्म हो रहा है। देश अब आर्थिक दक्षता (सस्ता माल) से ज्यादा सप्लाई चेन की सुरक्षा को महत्व दे रहे हैं।

  • अब उत्पादन सिर्फ वहां नहीं होता जहां मजदूरी सबसे कम हो। कंपनियां अब 'फ्रेंड-शोरिंग' (Friend-shoring) कर रही हैं—यानी कारखाने सिर्फ उन देशों में लगाए जा रहे हैं जो रणनीतिक रूप से मित्र हैं, ताकि युद्ध या संकट के समय सप्लाई न रुके।

2. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का पतन

संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व व्यापार संगठन (WTO) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) जैसी संस्थाएं लगभग पंगु हो गई हैं। देश अब बहुपक्षीय संधियों (Multilateral treaties) में विश्वास नहीं करते। वे दो देशों के बीच द्विपक्षीय (Bilateral) समझौतों को प्राथमिकता दे रहे हैं ताकि वे अपनी शर्तों पर बातचीत कर सकें।

3. प्रौद्योगिकी का बाल्कनीकरण (Balkanization of Technology)

अब एक 'ग्लोबल इंटरनेट' या साझा तकनीक नहीं है। राष्ट्रवाद तकनीक के क्षेत्र में पहुंच गया है। अमेरिका और चीन के बीच सेमीकंडक्टर चिप्स, 5G तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। देश अपने नागरिकों का डेटा अपनी सीमाओं के भीतर (Data Localization) रखना चाहते हैं।

4. गहराता सामाजिक ध्रुवीकरण (Social Polarization)

राष्ट्रवादी राजनीति अक्सर 'हम बनाम वे' (Us vs. Them) पर आधारित होती है। इसके कारण देशों के भीतर ही नागरिक दो हिस्सों में बंट गए हैं। प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और वैश्विक सोच रखने वालों को अक्सर शक की नजर से देखा जाने लगा है, जिससे सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंच रहा है।

निष्कर्ष और आगे का रास्ता: क्या हम एक नई दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं?

राष्ट्रवाद का यह उभार अपने आप में पूरी तरह से गलत नहीं है। जब सरकारें अपने नागरिकों के रोजगार की चिंता करती हैं, अपनी सप्लाई चेन को सुरक्षित करती हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करती हैं, तो यह एक स्वस्थ और जवाबदेह लोकतंत्र का संकेत है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक बार कहा था कि "देशभक्ति (Patriotism) अपने देश से प्यार करना है, जबकि राष्ट्रवाद (Nationalism) दूसरों से नफरत करना है।" खतरा तब पैदा होता है जब देशभक्ति, उग्र राष्ट्रवाद में बदल जाती है।

भविष्य की चुनौती: आज मानवता जिन संकटों का सामना कर रही है—चाहे वह जलवायु परिवर्तन (Climate Change) हो, नई महामारियों का खतरा हो, या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बेलगाम विकास—इनका समाधान कोई भी देश अपनी सीमाएं बंद करके अकेले नहीं निकाल सकता। कार्बन उत्सर्जन या वायरस को रोकने के लिए कोई सीमा काम नहीं आती।

अंततः, दुनिया को एक 'जिम्मेदार और संतुलित राष्ट्रवाद' (Responsible Nationalism) की आवश्यकता है। एक ऐसी व्यवस्था जहां राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्था और अपने नागरिकों की रक्षा को प्राथमिकता दें, लेकिन वैश्विक अस्तित्व के खतरों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का त्याग न करें। 21वीं सदी की सफलता इसी बात पर निर्भर करेगी कि दुनिया के देश अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता और वैश्विक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।

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