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नौकरशाही और विकास

नौकरशाही और विकास: भारत के संदर्भ में 

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और विकासशील लोकतंत्र में 'विकास' केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह 140 करोड़ से अधिक नागरिकों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने की एक निरंतर यात्रा है। इस महा-यात्रा में नौकरशाही (Bureaucracy) यानी सिविल सेवा वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द नीतियां बनती हैं, बजट आवंटित होते हैं और योजनाएं धरातल पर उतरती हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात 'लौह फ्रेमवर्क' के रूप में विरासत में मिली नौकरशाही ने राष्ट्र निर्माण में अपरिहार्य भूमिका निभाई है, किंतु समय के साथ इसकी कार्यप्रणाली, चुनौतियों और भविष्य के स्वरूप को लेकर गंभीर बहस छिड़ी हुई है। आइए, भारत के संदर्भ में नौकरशाही और विकास के इस अंतर्संबंध का सूक्ष्म और व्यापक विश्लेषण करते हैं।

1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और विकास में नौकरशाही की आधारशिला

ब्रिटिश काल में भारतीय सिविल सेवा (ICS) का मुख्य उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना और कर संग्रह (Revenue Collection) करना था, न कि जन-कल्याण। लेकिन 1947 में आज़ादी मिलने के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और नीति निर्माताओं ने इसे एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के रूप में ढाला।

  • पंचवर्षीय योजनाएं और बुनियादी ढांचा: शुरुआती दशकों में बांधों का निर्माण, भाखड़ा नांगल परियोजना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की स्थापना और हरित क्रांति को सफल बनाने में नौकरशाही का प्रशासनिक कौशल रीढ़ साबित हुआ।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं का स्थायित्व: भारत जैसे खंडित और बहु-सांस्कृतिक देश में लोकतंत्र को बचाए रखने और आम चुनावों को शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराने में प्रशासनिक और पुलिस तंत्र की भूमिका ऐतिहासिक रही है।
  • अखंडता की रक्षा: देश के एकीकरण (रियासतों का विलय) से लेकर आंतरिक सुरक्षा के मोर्चों पर सिविल सेवकों ने राष्ट्र की संप्रभुता को बनाए रखा।

2. विकास प्रक्रिया में नौकरशाही के सकारात्मक आयाम

आज भी जब देश के किसी दूर-दराज के जिले में कोई जिलाधिकारी (DM) नए स्कूल, अस्पताल या सड़क का निर्माण सुनिश्चित करता है, तो वह सीधे तौर पर विकास की गति को तेज कर रहा होता है।

  • योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन: 'मनरेगा', 'प्रधानमंत्री आवास योजना', 'आयुष्मान भारत' और 'जल जीवन मिशन' जैसी योजनाएं बिना एक मजबूत प्रशासनिक मशीनरी के क्रियान्वित नहीं हो सकतीं।
  • संकट प्रबंधन और आपदा राहत: कोविड-19 महामारी के दौरान टीकाकरण अभियान, बाढ़ या चक्रवात जैसी आपदाओं में राहत सामग्री पहुँचाने और लॉकडाउन के दौरान आपूर्ति श्रृंखला बनाए रखने में नौकरशाही की कार्यकुशलता जगजाहिर रही है।
  • आर्थिक उदारीकरण (1991): वर्ष 1991 के वित्तीय संकट के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के साथ-साथ कई दूरदर्शी नौकरशाहों (जैसे मोंटेक सिंह आहलूवालिया आदि) ने देश को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ने में अहम नीतियां बनाईं।

3. विकास के मार्ग में प्रशासनिक बाधाएं और चुनौतियाँ

यद्यपि नौकरशाही के इरादे नेक होते हैं, लेकिन इसकी संरचनात्मक और कार्यप्रणाली से जुड़ी कुछ गंभीर कमियां आज देश के विकास में बाधा बन रही हैं:

[विकास की राह में प्रमुख अवरोधक]
├── लाल फीताशाही (Red Tapism)  ──> फाइलों का महीनों एक टेबल से दूसरी टेबल पर अटका रहना।
├── जवाबदेही का भारी अभाव     ──> विफलता की स्थिति में विरले ही किसी अधिकारी की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होना।
├── दीमक रूपी भ्रष्टाचार      ──> टेंडर प्रक्रियाओं और फंड आवंटन में लीकेज व कमीशनखोरी।
└── सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ    ──> तकनीकी रूप से जटिल क्षेत्रों में भी केवल प्रशासनिक अनुभव को प्राथमिकता देना।
  • अनम्यता (Rigidity) और औपनिवेशिक मानसिकता: नियमों का अत्यधिक पालन करने की आदत (Rule-bound behavior) के कारण कई बार मानवीय संवेदनाएं और व्यावहारिक दृष्टिकोण पीछे छूट जाते हैं।
  • राजनीतिकरण: जब प्रशासनिक अधिकारियों और राजनीतिक नेतृत्व के बीच की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं, तो मेरिट के बजाय चापलूसी को बढ़ावा मिलता है, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं।

4. सुशासन (Good Governance) की ओर संक्रमण और सुधार

आधुनिक भारत की बदलती प्राथमिकताओं को देखते हुए नौकरशाही में सुधार के कई क्रांतिकारी कदम उठाए गए हैं ताकि 'रूलर' (शासक) की मानसिकता को बदलकर 'फैसिलिटेटर' (सुविधाप्रदाता) की भूमिका में लाया जा सके:

  • डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT), आधार आधारित भुगतान और ऑनलाइन पोर्टल ने बिचौलियों की भूमिका को लगभग समाप्त कर दिया है। इससे भ्रष्टाचार में कमी आई है।
  • मिशन कर्मयोगी (National Programme for Civil Services Capacity Building): इसका उद्देश्य सिविल सेवकों को अधिक 'रचनात्मक, सृजनात्मक, प्रोफेशनल्स और प्रौद्योगिकी-सक्षम' बनाना है ताकि वे भविष्य की चुनौतियों से निपट सकें।
  • लेटरल एंट्री (Lateral Entry): सरकार द्वारा तकनीक, डेटा साइंस और अर्थशास्त्र जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के निजी विशेषज्ञों को सीधे उच्च पदों पर नियुक्त करना एक बड़ा सकारात्मक कदम है।
  • आरटीआई (RTI) और नागरिक चार्टर (Citizen Charter): जनता को सूचना का अधिकार मिलने से प्रशासन अधिक पारदर्शी और जनता के प्रति उत्तरदायी बना है।

5. निष्कर्ष और 'विकसित भारत 2047' का विजन

भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए एक 'SMART' (सेंसिटिव, मॉडर्न, अकाउंटेबल, रिस्पॉन्सिव और ट्रांसपेरेंट) नौकरशाही की आवश्यकता है। अब समय आ गया है कि अधिकारी फाइलों के बोझ से बाहर निकलकर परिणामों (Outcomes) पर ध्यान दें।

जब तक प्रशासन जनता के साथ 'सहभागी विकास' (Participatory Development) के मॉडल को नहीं अपनाएगा, तब तक समावेशी विकास का सपना अधूरा रहेगा। एक पारदर्शी, तकनीक-युक्त और संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था ही भारत को वैश्विक महाशक्ति बनाने के मार्ग को प्रशस्त कर सकती है।


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