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भारतीय संविधान का निर्माण

भारतीय संविधान के निर्माण में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का योगदान

भारत का संविधान केवल 9 दिसंबर 1946 से 26 नवंबर 1949 के बीच संविधान सभा के कक्ष में बैठकर तैयार किया गया कानूनी दस्तावेज नहीं है। वास्तव में, यह उस लंबे, रक्त-रंजित और वैचारिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की परिणति है, जो 19वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर 1947 तक चला। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिन मूल्यों, अधिकारों और व्यवस्थाओं की मांग ब्रिटिश सरकार से की गई थी, उन्हीं मांगों ने स्वतंत्र भारत के संविधान की नींव रखी।

संविधान निर्माताओं ने कोई नया ढांचा शून्य से नहीं गढ़ा, बल्कि उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के उन वादों को कानूनी जामा पहनाया, जो उन्होंने देश की जनता से किए थे। आइए, इस विषय पर गहराई से विचार करें कि राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न चरणों ने हमारे संविधान को कैसे आकार दिया:

1. नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संघर्ष

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीयों को बोलने, लिखने या सभा करने की आजादी नहीं थी। 'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट' से लेकर 'रॉलेट एक्ट' तक, हर कानून का उद्देश्य भारतीयों की आवाज को दबाना था। बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं को केवल लेख लिखने के लिए जेल में डाल दिया गया था।

  • संविधान में प्रभाव: इस ऐतिहासिक दमन के अनुभव ने ही यह तय कर दिया था कि आजाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोच्च होगी। आज संविधान का अनुच्छेद 19 (बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी) स्वतंत्रता सेनानियों के उसी लंबे संघर्ष का सीधा परिणाम है।

2. नेहरू रिपोर्ट (1928): स्वदेशी संविधान का प्रथम ब्लूप्रिंट

1927 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो उसमें एक भी भारतीय नहीं था। अंग्रेजों की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में 1928 में 'नेहरू रिपोर्ट' तैयार की गई। यह भारतीयों द्वारा अपने लिए संविधान बनाने का पहला ऐतिहासिक प्रयास था।

  • संविधान में प्रभाव: इस रिपोर्ट में पहली बार 19 मौलिक अधिकारों की मांग की गई थी। इसके अलावा महिलाओं के लिए समान अधिकार, ट्रेड यूनियन बनाने की आजादी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बात कही गई थी, जिन्हें बाद में वर्तमान संविधान में ज्यों का त्यों या संशोधित रूप में अपनाया गया।

3. 1931 का कराची अधिवेशन: मौलिक अधिकारों का घोषणापत्र

सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के कराची अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने अपना सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण स्पष्ट किया।

  • संविधान में प्रभाव: इस अधिवेशन में पारित 'मौलिक अधिकार और आर्थिक कार्यक्रम' के प्रस्ताव ने यह सुनिश्चित कर दिया कि संविधान केवल सत्ता के हस्तांतरण का दस्तावेज नहीं होगा। मजदूर अधिकारों, मुफ्त प्राथमिक शिक्षा, और अल्पसंख्यकों की संस्कृति की रक्षा के जो संकल्प कराची में लिए गए, वे आज संविधान के भाग-III (मौलिक अधिकार) में मजबूती से दर्ज हैं।

4. सामाजिक न्याय, पूना पैक्ट और अस्पृश्यता का अंत

राष्ट्रीय आंदोलन केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह समाज के भीतर फैली कुरीतियों (जैसे- छुआछूत और जातिवाद) के खिलाफ भी एक जंग थी। महात्मा गांधी का हरिजन आंदोलन, डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दलित उत्थान संघर्ष और 1932 का ऐतिहासिक 'पूना पैक्ट' इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

  • संविधान में प्रभाव: संविधान का अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का पूर्णतः उन्मूलन) और अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जातियों, जनजातियों और कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की रक्षा) सीधे तौर पर इसी सामाजिक सुधार आंदोलन की देन हैं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण की व्यवस्था भी पूना पैक्ट की वैचारिक पृष्ठभूमि से ही निकली है।

5. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार: लोकतंत्र पर अटूट विश्वास

पश्चिमी देशों (यहां तक कि अमेरिका और ब्रिटेन) में महिलाओं और गरीबों को वोट देने का अधिकार बहुत लंबी लड़ाई के बाद मिला था। ब्रिटिश भारत में भी 1935 के अधिनियम के तहत केवल 10-12% लोगों (संपत्ति और शिक्षा के आधार पर) को वोट का अधिकार था।

  • संविधान में प्रभाव: भारतीय नेताओं ने जनता के साथ मिलकर जन-आंदोलन किए थे, इसलिए उन्हें भारत की गरीब और अशिक्षित जनता की समझदारी पर पूरा भरोसा था। यही कारण है कि संविधान सभा ने बिना किसी संकोच के अनुच्छेद 326 के तहत सभी वयस्कों को एक समान मतदान का अधिकार दिया।

6. धर्मनिरपेक्षता और बहुलवादी समाज की स्थापना

स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी ताकत इसकी हिंदू-मुस्लिम एकता और बहुलवाद (Pluralism) थी। हालांकि देश का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ, जिसने गहरा घाव दिया, लेकिन भारतीय नेतृत्व इस बात पर अडिग रहा कि भारत एक 'हिंदू राष्ट्र' नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष राज्य बनेगा।

  • संविधान में प्रभाव: राष्ट्रीय आंदोलन की यह साझी विरासत संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 29-30 (अल्पसंख्यकों के सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार) के रूप में सामने आई।

7. आर्थिक समानता और राज्य के नीति निर्देशक तत्व (DPSP)

1930 के दशक तक राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ चुका था। 1938 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में 'राष्ट्रीय योजना समिति' (National Planning Committee) का गठन हुआ था, जिसका उद्देश्य आजाद भारत की आर्थिक नीतियां तय करना था।

  • संविधान में प्रभाव: भारत एक 'कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) होगा, यह विचार आयरलैंड के संविधान से जरूर लिया गया, लेकिन इसकी आत्मा भारतीय थी। संविधान के भाग-IV (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) में शामिल काम का अधिकार, समान कार्य के लिए समान वेतन, और धन के संकेंद्रण पर रोक—ये सभी राष्ट्रीय आंदोलन के आर्थिक संकल्प थे।

8. गांधीवादी दर्शन और ग्राम स्वराज

महात्मा गांधी का मानना था कि "भारत की आत्मा गांवों में बसती है।" वे सत्ता के विकेंद्रीकरण (Decentralization) के प्रबल समर्थक थे।

  • संविधान में प्रभाव: हालांकि संविधान का मूल ढांचा केंद्रोन्मुखी (Centralized) है, लेकिन गांधीजी के ग्राम स्वराज के सपने को अनुच्छेद 40 (ग्राम पंचायतों का संगठन) और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने वाले अनुच्छेदों के माध्यम से नीति निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया। (बाद में 73वें और 74वें संशोधन ने इसे और मजबूत किया)।

9. साम्राज्यवाद का विरोध और विश्व शांति

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन हमेशा से वैश्विक उपनिवेशवाद (Colonialism) और साम्राज्यवाद के खिलाफ रहा। भारतीय नेताओं ने स्पेन, चीन और अफ्रीका में हो रहे दमन का विरोध किया था।

  • संविधान में प्रभाव: इसी अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण संविधान के अनुच्छेद 51 में यह निर्देशित किया गया है कि राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देगा और राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखेगा।

10. उद्देश्य प्रस्ताव (Objective Resolution): आंदोलन का सारांश

13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा पेश किया गया 'उद्देश्य प्रस्ताव' असल में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देखे गए सपनों का एक लिखित मसौदा था। इसमें स्पष्ट किया गया कि भारत एक स्वतंत्र, संप्रभु और गणतंत्र देश होगा।

  • संविधान में प्रभाव: यही उद्देश्य प्रस्ताव परिष्कृत होकर हमारे संविधान की प्रस्तावना (Preamble) बना। प्रस्तावना में उल्लिखित 'न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक)', 'स्वतंत्रता', 'समानता' और 'बंधुता' जैसे शब्द सीधे तौर पर स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों से लिए गए हैं।

निष्कर्ष ग्रानविले ऑस्टिन जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार ने सही कहा है कि भारत का संविधान एक "सामाजिक दस्तावेज" (Social Document) है। यदि संविधान सभा ने इस दस्तावेज को 'शरीर' प्रदान किया, तो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने इसमें 'आत्मा' फूंकी। स्वाधीनता संग्राम के दौरान सड़कों, जेलों और अधिवेशनों में जो वाद-विवाद हुए, उन्होंने ही एक ऐसे संविधान की रूपरेखा तैयार की जो आज भी 140 करोड़ से अधिक भारतीयों को एकता, समानता और लोकतंत्र के सूत्र में बांधे हुए है।

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