पेरियार ई. वी. रामास्वामी के सम्पूर्ण राजनीतिक विचार: सामाजिक न्याय और आत्म-सम्मान के प्रणेता
भारतीय राजनीति और सामाजिक सुधार के इतिहास में पेरियार इरोड वेंकट नायकर रामास्वामी (E. V. Ramasamy) का नाम एक क्रांतिकारी विचारक के रूप में दर्ज है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में 'पेरियार' (जिसका अर्थ होता है 'महान व्यक्ति' या 'सम्मानित बुजुर्ग') के नाम से मशहूर रामास्वामी ने समाज में गहरी जड़ें जमा चुकी असमानता, जातिवाद और रूढ़िवादिता पर कड़ा प्रहार किया।
उनका राजनीतिक दर्शन केवल सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका मुख्य उद्देश्य एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जहां हर व्यक्ति को समानता और आत्म-सम्मान (Self-Respect) मिले। आइए, पेरियार के सम्पूर्ण राजनीतिक विचारों और उनके दर्शन को विस्तार से समझते हैं।
1. आत्म-सम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement)
पेरियार की राजनीति का सबसे प्रमुख स्तंभ उनका 'आत्म-सम्मान आंदोलन' था, जिसकी शुरुआत उन्होंने 1925 में की थी। पेरियार का मानना था कि राजनीतिक आज़ादी से कहीं ज़्यादा ज़रूरी सामाजिक आज़ादी है।
- मूल विचार: उनका तर्क था कि जब तक समाज में ऊंच-नीच का भाव रहेगा, तब तक राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।
- आत्म-सम्मान विवाह: उन्होंने बिना किसी पुरोहित या ब्राह्मण के विवाह कराने की प्रथा शुरू की, जिसे 'आत्म-सम्मान विवाह' कहा गया। इसमें दहेज प्रथा का कड़ा विरोध किया गया और पति-पत्नी को समान दर्ज़ा दिया गया।
2. जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद का कड़ा विरोध
पेरियार भारतीय समाज में मौजूद वर्ण व्यवस्था के सबसे प्रखर आलोचकों में से एक थे। उनका मानना था कि हिंदू समाज में ब्राह्मणवादी वर्चस्व ही पिछड़े और दलित वर्गों के शोषण का मुख्य कारण है।
- समानता की मांग: उन्होंने तर्क दिया कि जन्म के आधार पर किसी को श्रेष्ठ और किसी को नीचा मानना मानवता के खिलाफ है।
- मंदिरों में प्रवेश: उन्होंने निचली जातियों के लोगों के लिए मंदिरों में प्रवेश और सार्वजनिक सड़कों के इस्तेमाल के अधिकार के लिए कई बड़े आंदोलन किए, जिनमें 1924 का 'वाइकोम सत्याग्रह' (Vaikom Satyagraha) सबसे प्रसिद्ध है।
3. तर्कवाद और धर्म की आलोचना (Rationalism)
पेरियार अंधविश्वास, पाखंड और धार्मिक रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उनकी राजनीति में तर्क (Reason) और विज्ञान (Science) का स्थान सबसे ऊपर था।
- नास्तिकता का प्रचार: पेरियार ने खुले तौर पर ईश्वर के अस्तित्व को नकारा। उनका एक बहुत ही प्रसिद्ध नारा था: "ईश्वर नहीं है, ईश्वर बिल्कुल नहीं है। जिसने ईश्वर का आविष्कार किया वह मूर्ख है, जो ईश्वर का प्रचार करता है वह धूर्त है, और जो ईश्वर की पूजा करता है वह बर्बर है।"
- उनका मानना था कि धर्म का उपयोग हमेशा से आम जनता को डराने, उन्हें अज्ञानी बनाए रखने और उन पर शासन करने के लिए एक राजनीतिक औज़ार के रूप में किया गया है।
4. महिला सशक्तिकरण और नारीवाद (Feminism)
राजनीतिक और सामाजिक विचारकों में पेरियार अपने समय से बहुत आगे थे, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों को लेकर।
- समान अधिकार: उनका मानना था कि समाज तभी तरक्की कर सकता है जब महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार मिलें। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा और संपत्ति में उनके अधिकार की पुरजोर वकालत की।
- रूढ़ियों से आज़ादी: उन्होंने बाल विवाह का कड़ा विरोध किया और विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। पेरियार ने महिलाओं को गर्भनिरोधक (Birth Control) के इस्तेमाल का अधिकार देने की वकालत की, जो उस दौर में एक बहुत ही क्रांतिकारी विचार था।
5. भाषा, संस्कृति और द्रविड़ पहचान (Dravidian Identity)
पेरियार की राजनीति में 'द्रविड़ पहचान' का बहुत बड़ा महत्व था। उनका मानना था कि उत्तर भारतीय आर्य संस्कृति ने दक्षिण भारतीय द्रविड़ संस्कृति पर अपना वर्चस्व थोपा है।
- हिंदी थोपने का विरोध: 1937-38 में जब मद्रास प्रेसीडेंसी में हिंदी को अनिवार्य किया गया, तो पेरियार ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने इसे उत्तर भारतीय साम्राज्यवाद और तमिल भाषा तथा संस्कृति को खत्म करने की एक साज़िश माना।
- द्रविड़ नाडु की मांग: उन्होंने एक समय पर दक्षिण भारतीय राज्यों को मिलाकर एक स्वतंत्र 'द्रविड़ नाडु' (Dravida Nadu) देश बनाने की मांग भी उठाई थी। हालांकि, बाद में राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इस मांग को छोड़ दिया गया और इसे राज्यों की स्वायत्तता (State Autonomy) की मांग में बदल दिया गया।
6. मुख्यधारा के राष्ट्रवाद की आलोचना
पेरियार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और महात्मा गांधी की नीतियों के आलोचक थे। हालांकि शुरुआत में वे कांग्रेस के सदस्य थे, लेकिन उन्होंने यह महसूस किया कि यह पार्टी सवर्णों (विशेषकर ब्राह्मणों) के हितों से संचालित है। उन्होंने गांधीजी के 'रामराज्य' के विचार का विरोध किया, क्योंकि पेरियार के अनुसार रामराज्य का मतलब उसी पुरानी वर्ण व्यवस्था को वापस लाना था जिसमें जातिगत भेदभाव मौजूद था।
निष्कर्ष
पेरियार ई. वी. रामास्वामी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे एक महान समाज सुधारक और तार्किक विचारक थे। उनका राजनीतिक दर्शन सत्ता से ज़्यादा 'सामाजिक न्याय' (Social Justice) पर केंद्रित था। आज तमिलनाडु की राजनीति (चाहे वह DMK हो या AIADMK) पूरी तरह से पेरियार के द्रविड़ियन और आत्म-सम्मान के सिद्धांतों पर ही खड़ी है।
पेरियार के विचार आज भी हमें यह याद दिलाते हैं कि जब तक समाज से जातिवाद, अंधविश्वास और लैंगिक भेदभाव खत्म नहीं होता, तब तक सच्चा लोकतंत्र और सच्ची आज़ादी अधूरी है।
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