भारतीय विदेश नीति का विकास: निरंतरता और परिवर्तन :आदर्शवाद से सामरिक यथार्थवाद तक
भारतीय विदेश नीति (Indian Foreign Policy) का इतिहास महज़ कूटनीतिक समझौतों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक महान सभ्यता के वैश्विक मंच पर पुनरुत्थान की जीवंत कहानी है। स्वतंत्रता के समय संसाधनों से महरूम एक नव-स्वतंत्र राष्ट्र से लेकर आज की एक उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति (Rising Global Power) बनने तक, भारत की यह यात्रा 'निरंतरता' और 'परिवर्तन' का एक बेहतरीन संतुलन रही है।
इस लेख में हम इस पूरी यात्रा को और अधिक गहराई से, ऐतिहासिक चरणों, आंतरिक-बाहरी कारकों और भविष्य की संभावनाओं के साथ समझेंगे।
1. नेहरूवादी युग और आदर्शवादी नींव (1947–1962)
आज़ादी के समय भारत के सामने राष्ट्र निर्माण की असीम चुनौतियाँ थीं—गरीबी, अशिक्षा, भुखमरी और आंतरिक विखंडन। ऐसे नाजुक वक्त में देश के पहले प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने विदेश नीति की धुरी शांति, संप्रभुता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बनाया।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) का शंखनाद: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया दो ध्रुवों (पूंजीवादी अमेरिकी गुट और साम्यवादी सोवियत गुट) में बँट चुकी थी। भारत ने अपनी नई-नई मिली आज़ादी को किसी भी खेमे के पास गिरवी रखने से इनकार कर दिया। नेहरू, यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, मिस्र के गमाल अब्देल नासिर और इंडोनेशिया के सुकर्णो के साथ मिलकर 'गुटनिरपेक्षता' की नींव रखी। इसका उद्देश्य स्वतंत्र निर्णय लेना था, न कि तटस्थ रहना।
- पंचशील के सिद्धांत (1954): भारत और चीन के बीच तिब्बत को लेकर हुए समझौते में 'पंचशील' के पाँच सिद्धांत सामने आए—एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का परस्पर सम्मान, अनाक्रमण, आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप, समानता और पारस्परिक लाभ, तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।
- वैश्विक शांति और संयुक्त राष्ट्र: कोरियाई युद्ध, स्वेज संकट और कांगो संकट जैसे मामलों में भारत ने शांति सेना भेजकर वैश्विक स्तर पर एक नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाई।
मोड़ का बिंदु (Turning Point): 1962 के भारत-चीन युद्ध ने नेहरूवादी आदर्शवाद को तगड़ा झटका दिया। 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा धराशायी हो गया। इससे देश को यह समझ आ गया कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में केवल नैतिक सिद्धांतों और भाईचारे से राष्ट्रीय सुरक्षा सुरक्षित नहीं रखी जा सकती, बल्कि उसके लिए सैन्य और सामरिक शक्ति अनिवार्य है।
2. यथार्थवाद की ओर झुकाव और कड़े कूटनीतिक निर्णय (1962–1991)
1962 के झटके के बाद भारत की विदेश नीति में धीरे-धीरे यथार्थवाद (Realism) की घुसपैठ शुरू हुई। देश ने अपनी सीमाओं की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभुत्व को कूटनीति के केंद्र में रखा।
- 1971 की ऐतिहासिक भारत-सोवियत संधि: जब अमेरिका-चीन-पाकिस्तान धुरी दक्षिण एशिया में भारत के खिलाफ सक्रिय हो रही थी, तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कूटनीतिक साहस का परिचय देते हुए अगस्त 1971 में सोवियत संघ के साथ 20 वर्षीय 'शांति, मित्रता और सहयोग संधि' पर हस्ताक्षर किए। इसने भारत को रणनीतिक कवच प्रदान किया।
- बांग्लादेश मुक्ति संग्राम (1971): पाकिस्तान के दो टुकड़े करके भारत ने यह साबित कर दिया कि वह अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति का उपयोग करने से पीछे नहीं हटेगा।
- पोखरण-1 (1974) परमाणु परीक्षण: 'स्माइलिंग बुद्धा' के नाम से किए गए इस पहले शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण ने दुनिया को बता दिया कि भारत अपनी वैज्ञानिक और सामरिक क्षमता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, भले ही इसके लिए पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना क्यों न करना पड़े।
3. उदारीकरण, भू-राजनीति और 'लुक ईस्ट' नीति (1991–2014)
वर्ष 1991 भारतीय इतिहास का एक टर्निंग पॉइंट था। एक तरफ सोवियत संघ का विघटन हुआ (जिससे भारत का पुराना रणनीतिक साझीदार छिन गया), और दूसरी तरफ देश गंभीर आर्थिक संकट (बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस) से गुजर रहा था।
- आर्थिक सुधार और वैश्वीकरण: प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने एलपीजी (LPG) सुधारों की शुरुआत की। विदेश नीति अब विशुद्ध रूप से आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy) से जुड़ गई।
- 'लुक ईस्ट' नीति (Look East Policy): भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और दक्षिण-पूर्व एशिया (ASEAN देशों) के साथ व्यापारिक व रणनीतिक रिश्ते गहरे करने के लिए 'लुक ईस्ट' नीति की शुरुआत की।
- पोखरण-2 और परमाणु शक्ति का दर्जा (1998): प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने मई 1998 में पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किए। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने कूटनीतिक दृढ़ता दिखाई और जल्द ही अमेरिका सहित दुनिया ने भारत को एक 'जिम्मेदार परमाणु शक्ति' के रूप में स्वीकार कर लिया।
- अमेरिका के साथ रणनीतिक गर्माहट: इसी दौर में भारत-अमेरिका संबंधों में एक नया अध्याय जुड़ा, जो 2005 के ऐतिहासिक 'भारत-अमेरिका परमाणु समझौते' (Indo-US Nuclear Deal) तक पहुँचा।
4. समकालीन दौर: बहु-संरेखण (Multi-Alignment) और 'एक्ट ईस्ट' से 'ग्लोबल साउथ' तक (2014 से वर्तमान)
वर्तमान समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर एक अत्यंत आक्रामक, सक्रिय और आत्मविश्वास से भरी नीति में बदल चुकी है। आज की नीति को 'मल्टी-अलाइनमेंट' कहा जाता है, यानी हर देश के साथ उसके और अपने हितों के आधार पर स्वतंत्र संबंध रखना।
- 'लुक ईस्ट' से 'एक्ट ईस्ट' और 'नेबरहुड फर्स्ट': आसियान देशों के साथ संबंधों को केवल देखने (Look) तक सीमित न रखकर उनपर तेजी से अमल (Act) करने पर जोर दिया गया। साथ ही, पड़ोसी देशों को प्राथमिकता दी गई।
- क्वाड (QUAD) और इंडो-पैसिफिक: चीन के आक्रामक रुख और हिंद-महासागर (Indo-Pacific) में उसकी दखलंदाजी को संतुलित करने के लिए भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर 'क्वाड' को पुनर्जीवित किया।
- रणनीतिक स्वायत्तता की नई मिसाल (रूस-यूक्रेन युद्ध): आज भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता का ऐसा उदाहरण पेश किया है कि वह अमेरिका के साथ क्वाड का हिस्सा बनकर चीन को घेरता है, तो वहीं पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता है और एस-400 मिसाइल सिस्टम भी प्राप्त करता है।
- ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत ने खुद को विकासशील देशों यानी 'ग्लोबल साउथ' (Global South) के प्रणेता के रूप में स्थापित किया है। जी-20 शिखर सम्मेलन (2023) की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाना इसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता थी।
तुलनात्मक अवलोकन: कल और आज की विदेश नीति
| मानदंड | प्रारंभिक दौर (1947-1990) | समकालीन दौर (2014-वर्तमान) |
|---|---|---|
| मुख्य फोकस | नैतिक आदर्शवाद, गुटनिरपेक्षता, और क्षेत्रीय सुरक्षा | आर्थिक विकास, प्रौद्योगिकी, और वैश्विक साझेदारी |
| दृष्टिकोण | प्रतिक्रियात्मक (Reactive) और सतर्क | सक्रिय (Proactive), मुखर और प्रयोगात्मक |
| महाशक्तियों से संबंध | एकतरफा झुकाव या दूरी बनाए रखना | मल्टी-अलाइनमेंट (सभी प्रमुख शक्तियों से स्वतंत्र संबंध) |
| वैश्विक भूमिका | एक नैतिक आवाज़ या दृष्टा (Observer) | नियम गढ़ने वाला (Rule-maker) और 'ग्लोबल साउथ' का नेता |
निष्कर्ष
भारतीय विदेश नीति का सफर इस बात का प्रमाण है कि कूटनीति में कोई भी सिद्धांत पत्थर की लकीर नहीं होता। भारत ने अपने संस्थापक पुरुषों द्वारा दिए गए 'अहिंसा, शांति और स्वायत्तता' के मूल डीएनए को नहीं छोड़ा है, बल्कि उसे समय की माँग के अनुसार 'सामरिक यथार्थवाद और राष्ट्रीय हित' के साले में ढाल लिया है। आज भारत ऐसी स्थिति में है जहाँ वह दुनिया की किसी भी महाशक्ति के दबाव में आए बिना, अपने 1.4 अरब नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखते हुए स्वतंत्र फैसले ले रहा है।
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