भारतीय संघवाद और संघ-राज्य संबंध: वर्तमान परिदृश्य, चुनौतियाँ और समाधान
भारत एक अर्ध-संघीय (Quasi-federal) राष्ट्र है, जहाँ संविधान द्वारा केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है। प्रसिद्ध संविधान विशेषज्ञ के.सी. व्हेयर (K.C. Wheare) ने भारतीय संविधान को 'अर्ध-संघीय' कहा है क्योंकि इसमें संघीय व्यवस्था के साथ-साथ एक मजबूत केंद्र का प्रावधान है। समय-समय पर संघ-राज्य संबंध (Centre-State Relations) भारतीय राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में रहे हैं।
1. संवैधानिक ढांचा और शक्तियों का विभाजन
भारतीय संविधान के भाग XI (अनुच्छेद 245-255) और सातवीं अनुसूची के तहत शक्तियों का त्रि-स्तरीय विभाजन किया गया है, जो देश के संघीय ढांचे की रीढ़ है:
- संघ सूची (Union List): इसमें राष्ट्रीय महत्व के 97 विषय (मूलतः) शामिल हैं, जैसे रक्षा, परमाणु ऊर्जा, विदेश मामले, रेलवे और बैंकिंग। इन पर केवल संसद कानून बना सकती है।
- राज्य सूची (State List): इसमें स्थानीय और क्षेत्रीय महत्व के 66 विषय (मूलतः) शामिल हैं, जैसे पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था, जन स्वास्थ्य, कृषि और स्थानीय शासन। सामान्य परिस्थितियों में इन पर केवल राज्य विधानसभाएं कानून बनाती हैं।
- समवर्ती सूची (Concurrent List): इसमें 47 विषय शामिल हैं, जैसे शिक्षा, वन, विवाह, और आपराधिक कानून। इन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन विवाद की स्थिति में केंद्र का कानून मान्य होता है।
2. वर्तमान परिदृश्य और प्रमुख विवाद (वर्तमान उदाहरण सहित)
हाल के वर्षों में केंद्र और राज्यों (विशेषकर गैर-राजनीतिक दलों द्वारा शासित राज्यों) के बीच संबंधों में कई स्तरों पर तनाव और असहमतियाँ देखी गई हैं:
- राज्यपाल की भूमिका और विधायी गतिरोध:
- उदाहरण: केरल, तमिलनाडु, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चितकाल के लिए रोकने या राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रखने को लेकर गंभीर कानूनी संघर्ष हुए।
- सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि राज्यपाल विधेयकों पर अत्यधिक विलंब नहीं कर सकते और उन्हें लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकारों का सम्मान करना चाहिए।
- वित्तीय संघवाद और राजस्व वितरण:
- उदाहरण: वस्तु एवं सेवा कर (GST) व्यवस्था लागू होने के बाद से राज्यों की अप्रत्यक्ष कर लगाने की स्वायत्तता सीमित हो गई है। केरल, पंजाब और कर्नाटक जैसे राज्यों ने केंद्रीय करों (Devolution of Taxes) के वितरण में उनके हिस्से और केंद्र द्वारा लगाए जाने वाले 'सेस और सरचार्ज' (Cess & Surcharge) के कारण राजस्व हिस्सेदारी घटने का मुद्दा बार-बार उठाया है।
- केंद्रीय जांच एजेंसियों का दायरा और संघीय अधिकार क्षेत्र:
- उदाहरण: पश्चिम बंगाल, केरल, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को दी गई 'सामान्य सहमति' (General Consent) को वापस ले लिया है। इन राज्यों का तर्क है कि केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक उपयोग किया जा रहा है, जो संघीय ढांचे के खिलाफ है।
- राज्यपाल बनाम मुख्यमंत्री संघर्ष:
- दिल्ली, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल जैसे क्षेत्रों में प्रशासनिक नियंत्रण, नौकरशाही (IAS/IPS अधिकारियों) की नियुक्तियों और स्थानांतरण को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच तीखे गतिरोध देखने को मिले हैं।
3. ऐतिहासिक आयोग और सिफारिशें
संघ-राज्य संबंधों को सुधारने और संतुलन बनाने के लिए समय-समय पर उच्च स्तरीय आयोगों का गठन किया गया है:
- सरकारिया आयोग (1983): इसने राज्यपाल की नियुक्ति में निष्पक्षता, अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के दुरुपयोग को रोकने और अंतर-राज्य परिषद (Inter-State Council) को सक्रिय करने की सिफारिश की।
- पूंछी आयोग (2007): इसने स्थानीय समवर्ती सूची के विषयों पर राज्यों से व्यापक परामर्श करने और राज्यपालों के कार्यकाल को सुरक्षित बनाने पर जोर दिया।
4. सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद (Cooperative vs Competitive Federalism)
"मजबूत राज्य ही एक सशक्त राष्ट्र की सुदृढ़ नींव का निर्माण करते हैं।"
तनाव और चुनौतियों के बावजूद, भारत में संघीय सहयोग को बढ़ावा देने के कई सकारात्मक कदम भी उठाए गए हैं:
- नीति आयोग (NITI Aayog): योजना आयोग के स्थान पर गठित इस संस्था ने राज्यों को नीति निर्माण में समान भागीदार बनाया है और 'टीम इंडिया' की भावना को बढ़ावा दिया है।
- जीएसटी काउंसिल (GST Council): यह एक सांविधिक निकाय है जहाँ केंद्र और सभी राज्यों के वित्त मंत्री मिलकर वित्तीय और कर संबंधी निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से लेते हैं, जो सहकारी संघवाद का बेहतरीन उदाहरण है।
- आकांक्षी जिला और ब्लॉक कार्यक्रम: इसके तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देश के पिछड़े जिलों और ब्लॉकों के विकास के लिए सामूहिक रूप से कार्य करती हैं।
5. निष्कर्ष
भारतीय संघवाद की सफलता इस बात में निहित है कि केंद्र और राज्य एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि सह-यात्री (Co-travellers) की तरह काम करें। राजनीतिक कटुता और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना, संवाद के माध्यमों को खुला रखना तथा सहकारी संघवाद को धरातल पर उतारना ही भारतीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता और अखंडता की असली ताकत है।
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