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नवीन सार्वजनिक प्रबंधन

नवीन सार्वजनिक प्रबंधन (New Public Management - NPM)

लोक प्रशासन के क्षेत्र में बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में आया नवीन सार्वजनिक प्रबंधन (New Public Management) आंदोलन केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं था, बल्कि यह शासन और राज्य की भूमिका को देखने के दृष्टिकोण में एक मौलिक वैचारिक क्रांति थी। पारंपरिक लोक प्रशासन की सीमाओं और कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के समक्ष उत्पन्न वित्तीय संकटों के जवाब में इस मॉडल का जन्म हुआ। यह लेख इसके सैद्धांतिक विकास, प्रमुख विचारकों, कार्यप्रणाली, और इसके दूरगामी प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं उद्भव के कारण

1970 और 1980 के दशक तक आते-आते दुनिया भर की प्रशासनिक प्रणालियों में गहरी शिथिलता आने लगी थी। पारंपरिक मॉडल (जिसे अक्सर 'वेबेरियन नौकरशाही' कहा जाता है) की विफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित रहे:

  • वित्तीय संकट: कल्याणकारी कार्यक्रमों के विस्तार के कारण सरकारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ गया, जिससे राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ने लगा।
  • लालफीताशाही और अकुशलता: अत्यधिक नियम, जटिल पदानुक्रम (Hierarchy) और निर्णय लेने में अत्यधिक देरी के कारण सरकारी मशीनरी सुस्त हो गई थी।
  • उत्तरदायित्व का अभाव: नौकरशाही जनता के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह महसूस नहीं करती थी, क्योंकि प्रशासनिक एकाधिकार के कारण नागरिकों के पास कोई अन्य विकल्प नहीं था।
  • निजी क्षेत्र की सफलता: इसी काल में वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निजी क्षेत्र ने असाधारण दक्षता और ग्राहक संतुष्टि का परिचय दिया, जिससे सरकार चलाने के तौर-तरीकों पर सवाल उठने लगे।

इन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप मार्गेट थैचर (यूनाइटेड किंगडम) और रोनाल्ड रीगन (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) के शासनकाल में प्रशासनिक सुधारों की एक नई लहर चली, जिसे अकादमिक रूप से 'नवीन सार्वजनिक प्रबंधन' कहा गया।

2. प्रमुख विचारक और सैद्धांतिक आधार

नवीन सार्वजनिक प्रबंधन के वैधानिकीकरण और वैचारिक विकास में कई विद्वानों का योगदान रहा है:

  • क्रिस्टोफर हुड (Christopher Hood): उन्होंने 1991 के अपने seminal लेख में NPM के सात मुख्य प्रशासनिक सिद्धांतों को रेखांकित किया और इसे 'प्रबंधकीय पुनरुत्थानवाद' (Managerialism) की संज्ञा दी।
  • ऑस्борन और गैबलर (Osborne and Gaebler): अपनी अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक 'रीइन्वेंटिंग गवर्नमेंट' (1992) में उन्होंने "उद्यमशील सरकार" (Entrepreneurial Government) के दस सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जो NPM का वैचारिक घोषणापत्र बने।
  • पॉल पोलिट (Pollitt) और डेविड ओसबर्न जैसे विचारकों ने यह तर्क दिया कि सरकार को केवल 'नाव चलाने' (Rowing) के बजाय 'नाव की दिशा तय करने' (Steering) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

3. नवीन सार्वजनिक प्रबंधन के मुख्य स्तंभ एवं विशेषताएं

NPM पारंपरिक नौकरशाही मॉडल से कई मायनों में भिन्न है। इसके प्रमुख स्तंभों को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत समझा जा सकता है:

क. प्रक्रिया के बजाय परिणाम पर जोर (Output over Input)

पारंपरिक व्यवस्था में इस बात का हिसाब रखा जाता था कि कितना बजट खर्च हुआ और कौन-कौन से नियमों का पालन किया गया। इसके विपरीत, NPM यह देखता है कि उस खर्च से वास्तविक परिणाम (Outcomes) क्या प्राप्त हुए और सेवा की गुणवत्ता कैसी रही।

ख. बाजार उन्मुखीकरण और प्रतिस्पर्धा (Marketization and Competition)

सार्वजनिक क्षेत्र के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए आंतरिक और बाह्य स्तर पर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाता है। ठेकेदारी (Contracting Out), प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) और वाउचर प्रणालियों के माध्यम से सेवाओं का वितरण किया जाता है।

ग. विकेंद्रीकरण और स्वायत्तता

बड़े और भारी-भरकम केंद्रीय मंत्रालयों को छोटी, स्वायत्त और उत्तरदायी कार्यकारी एजेंसियों (Executive Agencies) में विभाजित किया जाता है ताकि मैदानी स्तर पर त्वरित और लचीले निर्णय लिए जा सकें।

घ. ग्राहक-केंद्रित दृष्टिकोण (Citizen as Customer)

इस मॉडल में नागरिकों को केवल प्रशासनिक नियमों के अधीन रहने वाली 'प्रजा' या 'लाभार्थी' नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें बाजार के 'ग्राहकों' के रूप में देखा जाता है, जिन्हें मूल्य, गुणवत्ता और सेवा की त्वरित प्राप्ति का अधिकार है।

4. NPM के व्यावहारिक उपकरण (Instruments of NPM)

व्यावहारिक धरातल पर सरकारों ने इस मॉडल को लागू करने के लिए विभिन्न तकनीकों का उपयोग किया:

  • प्रदर्शन आधारित अनुबंध (Performance Contracts): अधिकारियों और विभागों के साथ वार्षिक लक्ष्य तय किए जाते हैं और उनका मूल्यांकन उनके प्रदर्शन के आधार पर होता है।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP - Public Private Partnership): बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों में निजी पूंजी और प्रबंधन कौशल का उपयोग करना।
  • उपयोगकर्ता शुल्क (User Charges): विशिष्ट सरकारी सेवाओं के लिए रियायती या पूर्ण लागत मूल्य पर शुल्क वसूलना ताकि वित्तीय बोझ कम हो सके।
  • मानव संसाधन में लचीलापन: आजीवन नौकरी (Tenure) की पारंपरिक गारंटी के स्थान पर प्रदर्शन-आधारित संविदात्मक नियुक्तियों (Performance-based Contracts) को बढ़ावा देना।

5. आलोचनात्मक मूल्यांकन और सीमाएं

हालांकि NPM ने प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि की है, परंतु इसे गंभीर आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है:

  1. लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण: आलोचकों का तर्क है कि नागरिकों को 'ग्राहक' बना देने से लोकतंत्र की मूल भावना आहत होती है। एक ग्राहक वही सेवा पाता है जिसके लिए वह भुगतान कर सके, जबकि एक नागरिक के रूप में हर व्यक्ति राज्य से अधिकारों की मांग कर सकता है—चाहे वह आर्थिक रूप से कमजोर क्यों न हो।
  2. सामाजिक न्याय और समानता की उपेक्षा: बाजार की ताकतें लाभ के पीछे भागती हैं। ऐसे में, दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों, पिछड़े वर्गों और हाशिये के समुदायों तक सेवा पहुंचाने में निजी क्षेत्र रुचि नहीं लेता, जिससे सामाजिक असमानता बढ़ सकती है।
  3. उत्तरदायित्व का संकट (Accountability Deficit): जब सरकारी कार्य निजी एजेंसियों को ठेके पर (Outsource) दे दिए जाते हैं, तो नीतिगत विफलता या भ्रष्टाचार की स्थिति में अंतिम रूप से किसकी जवाबदेही तय होगी, यह अस्पष्ट हो जाता है।
  4. अत्यधिक संकीर्ण दृष्टिकोण: आलोचकों के अनुसार, यह मॉडल केवल 'दक्षता' और 'लागत कटौती' पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करता है, जिससे लोक प्रशासन के नैतिक, मानवीय और कल्याणकारी उद्देश्य पीछे छूट जाते हैं।

6. निष्कर्ष और समकालीन प्रासंगिकता

नवीन सार्वजनिक प्रबंधन ने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लोक प्रशासन को एक नई दिशा दी और इसे जड़ता से निकालकर गतिशील बनाया। आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में, यद्यपि NPM की अति-बाजारवादी नीतियों की आलोचना होती है, फिर भी इसके कई तत्व—जैसे डिजिटल गवर्नेंस, पारदर्शिता, परिणाम-आधारित मूल्यांकन और ई-गवर्नेंस—आधुनिक सुशासन (Good Governance) का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हैं। प्रशासन के आधुनिक स्वरूप में अब NPM और लोक कल्याणकारी मूल्यों के बीच संतुलन साधने पर जोर दिया जा रहा है ।

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