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सुशासन

सुशासन : अवधारणा, आयाम, चुनौतियाँ और नवीन परिप्रेक्ष्य 

आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में 'शासन' (Government) की पारंपरिक परिभाषा अब प्रशासनिक सुधारों के नए और व्यापक प्रतिमान 'सुशासन' (Good Governance) के दायरे में समाहित हो चुकी है। परंपरागत रूप से शासन का मुख्य उद्देश्य आंतरिक शांति बनाए रखना, बाह्य आक्रमणों से देश की रक्षा करना और करों का संग्रहण करना था। किंतु 20वीं सदी के अंतिम दशकों में उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण और नागरिक-केंद्रित सोच के अभ्युदय ने शासन के स्वरूप और दर्शन को पूरी तरह बदल दिया है।

वैश्विक स्तर पर 'सुशासन' शब्द का औपचारिक और प्रभावी प्रयोग सबसे पहले विश्व बैंक (World Bank) द्वारा 1989 में अपनी एक रिपोर्ट (Sub-Saharan Africa: From Crisis to Sustainable Growth) में किया गया था। इसका उद्देश्य विकासशील देशों में संस्थागत विफलताओं, भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन की समस्याओं का समाधान खोजना था। आज सुशासन केवल एक प्रशासनिक शब्दावली नहीं रह गया है, बल्कि यह किसी भी राष्ट्र के संपूर्ण विकास, मानवाधिकारों की रक्षा और सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त बन चुका है।

सुशासन का सैद्धांतिक आधार और अर्थ

शाब्दिक अर्थ में 'सुशासन' का तात्पर्य "उत्तम या श्रेष्ठ शासन" से है। यह शासन चलाने का वह तरीका है जो जनहित, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व, प्रभावशीलता और सहभागिता के उच्च मानदंडों पर खरा उतरता है।

राजनीतिक चिंतकों और प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, सुशासन शक्ति के विकेंद्रीकरण और राज्य, बाजार तथा नागरिक समाज (Civil Society) के बीच एक संतुलित साझेदारी पर जोर देता है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने सुशासन को परिभाषित करते हुए इसके कुछ ऐसे मानवीय और लोकतांत्रिक मानदंडों को रेखांकित किया है, जो किसी भी शासन प्रणाली को जन-उन्मुख बनाते हैं:

  • यह सुनिश्चित करता है कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक प्राथमिकताएं व्यापक जनहित के आधार पर तय हों।
  • यह निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के सबसे कमजोर और हाशिए पर मौजूद वर्गों की आवाज को प्रतिनिधित्व प्रदान करता है।

सुशासन के आठ प्रमुख स्तंभ (Core Pillars of Good Governance)

यूएनडीपी (UNDP) और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रशासनिक निकायों के अनुसार, सुशासन की इमारत निम्नलिखित आठ मुख्य स्तंभों पर टिकी होती है:

  1. सहभागिता (Participation): विकास और नीति-निर्माण की प्रक्रिया में पुरुषों, महिलाओं, युवाओं और समाज के सभी वर्गों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सक्रिय भागीदारी होनी सैनडिंड है। स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति का सम्मान और संवाद की संस्कृति सहभागिता का मुख्य आधार है।
  2. कानून का शासन (Rule of Law): सुशासन के लिए यह अनिवार्य है कि कानूनी ढांचा निष्पक्ष हो और विशेषकर मानवाधिकारों की पूर्ण रक्षा की जाए। कानूनों का प्रवर्तन निष्पक्ष, बिना किसी भेदभाव के और न्यायसंगत होना चाहिए।
  3. पारदर्शिता (Transparency): पारदर्शिता का अर्थ है कि निर्णय और उनका क्रियान्वयन नियमों और कानूनों के अनुसार खुले तौर पर हो। सूचनाएं स्वतंत्र रूप से उपलब्ध हों और उन तक प्रभावित होने वाले लोगों की सहज पहुंच हो।
  4. उत्तरदायित्व (Accountability): न केवल सरकारी संस्थानों को बल्कि निजी क्षेत्र और नागरिक समाज संगठनों को भी जनता और अपने हितधारकों (Stakeholders) के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
  5. संवेदनशीलता (Responsiveness): प्रशासनिक तंत्र और संस्थाओं को उचित समय-सीमा के भीतर सभी हितधारकों की शिकायतों और जरूरतों को पूरा करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
  6. समावेशिता और समता (Consensus Oriented & Inclusiveness/Equity): समाज में विभिन्न हितों के बीच मध्यस्थता की आवश्यकता होती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि व्यापक सामुदायिक हित कैसे प्राप्त किए जाएं। साथ ही, समाज का कोई भी वर्ग अपने को उपेक्षित महसूस न करे और सभी को अपने जीवन में सुधार के समान अवसर मिलें।
  7. प्रभावशीलता और दक्षता (Effectiveness and Efficiency): संस्थानों और प्रक्रियाओं द्वारा उपलब्ध संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए समाज की आवश्यकताओं को पूरा करने वाले परिणाम देना ही प्रभावशीलता और दक्षता है। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और पर्यावरण की सुरक्षा भी शामिल है।
  8. उत्तरजीविता और नैतिक आचरण (Integrity & Ethics): प्रशासन में बैठे पदाधिकारियों का नैतिक चरित्र, सत्यनिष्ठा और भ्रष्टाचार मुक्त होना सुशासन की दीर्घकालिक सफलता की गारंटी है।

सुशासन के अनुप्रयोग : भारतीय संदर्भ और आधुनिक पहल

भारत जैसे विशाल, बहुसांस्कृतिक और विकासशील लोकतांत्रिक देश में सुशासन को धरातल पर उतारने के लिए पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक और तकनीकी सुधार किए गए हैं:

  • ई-गवर्नेंस और डिजिटल सशक्तिकरण: 'डिजिटल इंडिया' अभियान ने शासन प्रणाली को कागज रहित और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उमंग (UMANG) ऐप, डिजीलॉकर (DigiLocker), और विभिन्न राज्यों के एकीकृत सेवा पोर्टल के माध्यम से नागरिक घर बैठे प्रमाण पत्र, लाइसेंस और सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। इससे बिचौलियों की संस्कृति पर लगाम लगी है।
  • सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005): भारतीय प्रशासनिक इतिहास में आरटीआई एक्ट मील का पत्थर साबित हुआ है। इसने नागरिकों को सरकार से सवाल पूछने का अधिकार देकर 'गोपनीयता की संस्कृति' को समाप्त किया है और पारदर्शिता को बढ़ावा दिया है।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT - Direct Benefit Transfer): सरकारी योजनाओं की सब्सिडी और वित्तीय सहायता का पैसा सीधे लाभार्थियों के आधार-संबद्ध बैंक खातों में भेजने से राजकोषीय रिसाव (Leakage) रुका है और प्रणाली में अभूतपूर्व दक्षता आई है।
  • शिकायत निवारण और अनुश्रवण तंत्र: केंद्र सरकार का CPGRAMS (Centralised Public Grievance Redress And Monitoring System) पोर्टल तथा राज्य स्तर पर चलाए जाने वाले जनसुनवाई केंद्र नागरिकों को अपनी समस्याएं सीधे उच्च प्रशासनिक अधिकारियों तक पहुंचाने और उनकी स्थिति ट्रैक करने का मंच प्रदान करते हैं।
  • सहकारी संघवाद और स्थानीय स्वशासन: 73वें और 74वें संविधान संशोधन के माध्यम से त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था और शहरी स्थानीय निकायों को सशक्त कर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया गया है, जिससे जमीनी स्तर पर सुशासन की नींव मजबूत हुई है।

सुशासन के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएँ और चुनौतियाँ

सैद्धांतिक रूप से उत्कृष्ट दिखने वाली सुशासन की अवधारणा को व्यावहारिक धरातल पर क्रियान्वित करने में कई जटिल बाधाओं का सामना करना पड़ता है:

  1. लाल फीताशाही और जटिल नौकरशाही प्रक्रिया: अत्यधिक कागजी कार्रवाई, पुराने नियम और उत्तरदायित्व से बचने की प्रवृत्ति (Red Tapism) प्रशासनिक प्रक्रियाओं को धीमा कर देती है, जिससे आम जनता को कठिनाई होती है।
  2. व्यापक भ्रष्टाचार: भ्रष्टाचार सुशासन के लिए सबसे बड़ा दीमक है। यह संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को रोकता है और गरीबों के अधिकारों का हनन करता है।
  3. डिजिटल विभाजन (Digital Divide): यद्यपि भारत डिजिटल रूप से तेजी से आगे बढ़ रहा है, किंतु ग्रामीण, दूरदराज के क्षेत्रों तथा समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के पास आज भी इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की पहुंच सीमित है, जिससे वे ई-गवर्नेंस के लाभों से वंचित रह जाते हैं।
  4. जागरूकता और शिक्षा का अभाव: नागरिकों में अपने कानूनी अधिकारों, संवैधानिक प्रावधानों और सरकारी योजनाओं के प्रति पूर्ण जागरूकता न होना भी सुशासन के पूर्ण क्रियान्वयन में एक बड़ी रुकावट है।
  5. राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी: कई बार राजनीतिक दबाव या निहित स्वार्थों के कारण प्रशासनिक सुधारों और विकेंद्रीकरण को वह गति नहीं मिल पाती जिसकी आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष एवं भविष्य की राह

सुशासन कोई एक निश्चित गंतव्य नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली और गतिशील प्रक्रिया है। इसे प्राप्त करने के लिए केवल सरकारी तंत्र या कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए शासन के तीनों स्तंभों—सरकार, बाजार और नागरिक समाज—को समन्वित प्रयास करने होंगे।

जब तक प्रशासन के केंद्र में "नागरिक प्रथम" (Citizen First) की भावना का पूर्णतः पालन नहीं किया जाता और नीति-निर्माण की प्रक्रिया में समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की राय को शामिल नहीं किया जाता, तब तक सुशासन का उद्देश्य अधूरा रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा एनालिटिक्स और ब्लॉकचेन जैसी नवीन तकनीकों का पारदर्शी उपयोग, प्रशासनिक नैतिकता का सुदृढ़ीकरण और जन-जागरूकता ही एक समावेशी, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की नींव रख सकते हैं।


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