गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): संपूर्ण इतिहास, विकास, वैचारिक नीतियां और वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में इसकी प्रासंगिकता
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वैश्विक इतिहास में गुटनिरपेक्ष आंदोलन (Non-Aligned Movement - NAM) एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ था जिसने कमजोर और नव-स्वतंत्र राष्ट्रों को अपनी स्वतंत्र पहचान और आवाज दी। शीत युद्ध के साये में जन्मा यह संगठन आज 21वीं सदी की जटिल भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच नए रूपों में अपनी प्रासंगिकता तलाश रहा है।
इस विस्तृत आलेख में हम गुटनिरपेक्ष आंदोलन के इतिहास, इसके वैचारिक आधार, महत्वपूर्ण सम्मेलनों और वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता का गहन विश्लेषण करेंगे।
1. पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक उत्पत्ति (Historical Background)
द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) के बाद दुनिया की तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। ब्रिटेन, फ्रांस और पुर्तगाल जैसी पुरानी औपनिवेशिक शक्तियां कमजोर हो चुकी थीं और एशिया व अफ्रीका में स्वतंत्रता आंदोलनों का दौर शुरू हुआ। इसी समय दुनिया दो महाशक्तियों के बीच वैسكريक और सैन्य रूप से विभाजित हो गई:
- पूंजीवादी खेमा: जिसका नेतृत्व संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) कर रहा था (नाटो और अन्य सैन्य संधियों के माध्यम से)।
- साम्यवादी खेमा: जिसका नेतृत्व सोवियत संघ (USSR) कर रहा था (वारसा पैक्ट के माध्यम से)।
गंभीर दुविधा: नव-स्वतंत्र देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि यदि वे किसी एक महाशक्ति के पाले में जाते, तो वे अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता खो बैठते। यदि वे तटस्थ रहते, तो विकास के लिए आवश्यक आर्थिक और तकनीकी सहायता से वंचित हो जाते। इस दुविधा से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता एक सामूहिक मंच का निर्माण था।
2. बंडोउंग सम्मेलन और औपचारिक स्थापना (The Road to Belgrade)
गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव क्रमिक चरणों में रखी गई थी, जिसमें प्रमुख मील के पत्थर निम्नलिखित हैं:
- बंडोउंग सम्मेलन (1955): इंडोनेशिया के बांडुंग शहर में एशिया और अफ्रीका के 29 नव-स्वतंत्र देशों का सम्मेलन हुआ। इसे NAM का वैचारिक जनक माना जाता है। इसमें साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद और नस्लवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया।
- बेलग्रेड शिखर सम्मेलन (1961): औपचारिक रूप से 1 सितंबर 1961 को यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में पहला आधिकारिक शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें 25 देशों ने हिस्सा लिया।
- पंचशील और संस्थापक नेता: इस आंदोलन को दिशा देने वाले पांच महान नेता थे—भारत के जवाहरलाल नेहरू, यूगोस्लाविया के जोसफ ब्रोज टीटो, मिस्र के गामाल अब्देल नासिर, इंडोनेशिया के सुखार्नो और घाना के क्वामे नक्रमा। इन्होंने भारत के पंचशील सिद्धांतों (अनाक्रमण, संप्रभुता का सम्मान, आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप) को आंदोलन की मूल आत्मा बनाया।
3. गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मूल उद्देश्य और सिद्धांत
NAM कोई पारंपरिक सैन्य गठबंधन नहीं था, बल्कि यह एक राजनीतिक और नैतिक आंदोलन था जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे:
- स्वतंत्र विदेश नीति: महाशक्तियों के सैन्य गठबंधनों (जैसे NATO या SEATO) से पूरी तरह दूर रहकर अपनी स्वतंत्र नीतियां बनाना।
- साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का विरोध: दुनिया के किसी भी कोने में विदेशी शासन, नस्लभेदी नीतियों (जैसे दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद नीति) और उपनिवेशवाद का डटकर विरोध करना।
- वैश्विक शांति और निरस्त्रीकरण: परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना, हथियारों की होड़ को कम करना और विश्व शांति स्थापित करना।
- अंतरराष्ट्रीय आर्थिक न्याय: नव-स्वतंत्र देशों के आर्थिक विकास के लिए 'नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था' (NIEO) की मांग करना ताकि अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई को पाटा जा सके।
4. शीत युद्ध काल में NAM की भूमिका और चुनौतियाँ
शीत युद्ध के दशकों (1960 से 1980 के दशक) में NAM ने एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में कार्य किया। हालांकि, इस दौरान इस आंदोलन के भीतर भी कई अंतर्विरोध देखे गए:
- कुछ सदस्य देश सोवियत संघ के करीब झुक गए (जैसे क्यूबा), जबकि कुछ पश्चिमी देशों के पाले में दिखे।
- आपसी क्षेत्रीय विवादों (जैसे भारत-पाकिस्तान या ईरान-इराक युद्ध) के कारण आंदोलन की एकजुटता पर कई बार सवाल उठे।
- इसके बावजूद, विकासशील देशों की आवाज उठाने और उपनिवेशवाद के खिलाफ दबाव बनाने में NAM काफी हद तक सफल रहा।
5. वर्तमान समय में गुटनिरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता (Relevance in the 21st Century)
सोवियत संघ के विघटन (1991) के बाद जब शीत युद्ध समाप्त हुआ, तो कई राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मान लिया था कि NAM अप्रासंगिक हो चुका है। लेकिन 21वीं सदी की वर्तमान भू-राजनीतिक सच्चाइयाँ इसके विपरीत कहानी कहती हैं। आज NAM के पास 120 से अधिक सदस्य देश हैं। वर्तमान दौर में इसकी प्रासंगिकता के निम्नलिखित प्रमुख आधार हैं:
क) नया शीत युद्ध और बहुध्रुवीय विश्व (New Cold War & Multipolarity)
आज दुनिया एक बार फिर अमेरिका, चीन और रूस के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और व्यापार युद्ध (Trade Wars) का सामना कर रही है। ऐसे में विकासशील और छोटे देशों को किसी महाशक्ति के दबाव में आए बिना अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार निर्णय लेने के लिए NAM एक बड़ा कूटनीतिक सुरक्षा कवच प्रदान करता है।
ख) ग्लोबल साउथ (Global South) की सशक्त आवाज
आज पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) और निष्पक्ष वैश्विक व्यापार नियमों जैसे मुद्दों पर विकसित और विकासशील देशों के बीच गंभीर मतभेद हैं। भारत समेत ग्लोबल साउथ के देश NAM के मंच का उपयोग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी सामूहिक सौदेबाजी की ताकत (Collective Bargaining Power) को बढ़ाने के लिए करते हैं।
ग) बहुपक्षवाद (Multilateralism) की रक्षा
संयुक्त राष्ट्र (UN), विश्व बैंक (WB) और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) जैसी वैश्विक संस्थाओं में आज भी पश्चिमी देशों का दबदबा बना हुआ है। इन संस्थाओं में सुधार लाने और विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए लोकतांत्रिक बहुपक्षवाद की वकालत करना आज NAM की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
घ) पारंपरिक और गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियाँ
आतंकवादी खतरे, महामारी, साइबर सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा (जैसे हिंद महासागर में नौवहन की स्वतंत्रता) जैसी समस्याओं से कोई भी अकेला देश नहीं निपट सकता। ऐसे में साझा सहयोग के लिए यह मंच बेहद उपयोगी है।
6. निष्कर्ष
गुटनिरपेक्ष आंदोलन केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अध्याय नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाली वैचारिक यात्रा है। भले ही आज इसके स्वरूप में बदलाव आया हो, लेकिन स्वतंत्रता, संप्रभुता, शांति और न्याय के वे मूल्य जिन पर NAM की नींव रखी गई थी, आज की अशांत और ध्रुवीकृत दुनिया में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। विकासशील देशों की एकता ही वैश्विक संतुलन की सबसे बड़ी कुंजी है ।
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