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भारत में चुनावी राजनीति और सहभागिता

भारत में चुनावी राजनीति और सहभागिता: लोकतंत्र की धड़कन और बदलती हुई तस्वीर

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है और इस लोकतंत्र की असली ताकत इसकी चुनावी राजनीति और जन-सहभागिता (Electoral Politics and Participation) में निहित है। जब 2024 के आम चुनावों में लगभग 97 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाताओं में से करोड़ों लोग जाति, धर्म, भाषा और वर्ग की सीमाओं से ऊपर उठकर एक स्याही लगी उंगली के साथ मतदान केंद्र पहुँचे, तो उन्होंने सिर्फ एक सरकार नहीं चुनी, बल्कि देश के भविष्य की दिशा तय की।

हालिया आम चुनावों और राजनीतिक परिदृश्य के जमीनी अनुभवों से पता चलता है कि चुनावी सहभागिता का  सफर बदला है और आज इसके सामने  नए आयाम व चुनौतियाँ हैं।

1. चुनावी सहभागिता का बदलता स्वरूप: अधिक समावेशी लोकतंत्र

पारंपरिक रूप से भारतीय राजनीति में उच्च वर्गों और संभ्रांत समूहों का प्रभाव अधिक माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, विशेषकर हालिया लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़ों ने यह साबित कर दिया है कि जमीनी स्तर पर लोकतंत्र की परिभाषा बदल चुकी है:

  • नारी शक्ति का निर्णायक उभार: हालिया चुनावों में महिला मतदाताओं की सक्रियता ने राजनीतिक दलों के समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। आज स्थिति यह है कि कई राज्यों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के लगभग बराबर या उससे भी अधिक दर्ज किया जा रहा है। केंद्र सरकार का 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' (महिला आरक्षण कानून) हो या राज्य सरकारों की प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और लाडली बहना जैसी कल्याणकारी योजनाएँ, इन्होंने महिला मतदाताओं को एक 'स्वतंत्र और मुखर वोट बैंक' के रूप में स्थापित कर दिया है।
  • युवा और नए नेतृत्व की भागीदारी: हाल के चुनावों (जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव) में संसद के भीतर कई युवा और पहली बार चुनकर आईं महिला सांसदों (जैसे इकरा चौधरी, संजना जाटव, शांभवी चौधरी आदि) ने यह दिखाया है कि पारंपरिक राजनीतिक परिवारों से बाहर निकलकर आम परिवारों की युवा पीढ़ी भी चुनावी राजनीति के केंद्र में आ रही है।

2. सोशल मीडिया और डिजिटल कैंपेन: विचारों का नया अखाड़ा

आज की चुनावी राजनीति केवल रैलियों, पोस्टरों और चौपालों तक सीमित नहीं है। चुनाव अब मोबाइल स्क्रीन और एल्गोरिदम पर लड़े जा रहे हैं:

  • वर्चुअल रैलियाँ और एआई (AI) टूल्स: राजनीतिक दल अब व्हाट्सएप ग्रुप्स, इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब पॉडकास्ट और एक्स (ट्विटर) के माध्यम से सीधे मतदाताओं के तक पहुँच रहे हैं। चुनावों में एआई-जनरेटेड वॉयस और वीडियो (डीपफेक या प्रचार सामग्री) का उपयोग भी एक नया और संवेदनशील पहलू बन गया है।
  • डेटा ड्रिवन पॉलिटिक्स और नैरेटिव वॉर: पार्टियाँ बूथ-स्तर के डेटा का विश्लेषण करके यह तय करती हैं कि किस क्षेत्र में किस जाति, वर्ग या स्थानीय मुद्दे पर फोकस करना है। हालांकि, इसके साथ ही सोशल मीडिया पर 'फेक न्यूज' (Fake News), हेट स्पीच और ध्रुवीकरण करने वाले प्रोपेगंडा का प्रसार लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।

3. गठबंधन की राजनीति और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव

हालिया राष्ट्रीय चुनावों के नतीजे (जैसे 2024 के परिणाम) इस बात के गवाह हैं कि भारतीय मतदाता अब किसी एक दल को अजेय मानने के बजाय एक संतुलित जनादेश दे रहे हैं:

  • गठबंधन युग की वापसी: पूर्ण बहुमत के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों (जैसे टीडीपी, जदयू आदि) की केंद्र सरकार में निर्णायक भूमिका ने यह साबित कर दिया है कि भारत की संघीय व्यवस्था (Federalism) और क्षेत्रीय आकांक्षाएँ राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में सबसे महत्वपूर्ण हैं। क्षेत्रीय मुद्दे अब राष्ट्रीय एजेंडे का हिस्सा बन जाते हैं।

4. चुनावी राजनीति के सामने वर्तमान चुनौतियाँ

इतनी बड़ी और जीवंत सहभागिता के बावजूद, भारतीय चुनावी प्रणाली कुछ गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है:

  • धनबल और बाहुबल (Money and Muscle Power): चुनावों में पानी की तरह बहता काला धन और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों का मैदान में होना (जैसा कि विभिन्न रिपोर्ट्स में सामने आता है) निष्पक्षता और सुशासन पर सवाल खड़े करता है।
  • मुफ्त की रेवड़ियाँ (Freebies Culture vs. Development): चुनावों के दौरान दीर्घकालिक बुनियादी ढांचे या रोजगार सृजन के बजाय लोकलुभावन मुफ्त वादों (Freebies) की श्रृंखला ने राज्यों और केंद्र के राजकोषीय स्वास्थ्य पर दबाव बढ़ा दिया है।
  • शहरी उदासीनता (Urban Apathy): यह एक विडंबना है कि ग्रामीण इलाकों में रिकॉर्ड तोड़ मतदान होता है, लेकिन महानगरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु आदि) के शिक्षित और संभ्रांत वर्ग के मतदाता चुनाव के दिन मतदान केंद्रों से दूरी बनाए रखते हैं।

निष्कर्ष: लोकतंत्र को और परिपक्व बनाने की दिशा

भारत में चुनावी राजनीति केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक उत्सव है। जैसे-जैसे देश का युवा और जागरूक नागरिक इस प्रक्रिया में और अधिक सवाल पूछने लगा है, राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल रही हैं। लोकतंत्र की असली सफलता तभी है जब मतदाता केवल चुनाव के दिन स्याही लगी उंगली दिखाने तक सीमित न रहें, बल्कि साल के 365 दिन अपने जनप्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाएँ।

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