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जॉन रॉल्स का न्याय दर्शन और समकालीन कल्याणकारी राज्य

जॉन रॉल्स का न्याय दर्शन और समकालीन कल्याणकारी राज्य

राजनीतिक दर्शन के क्षेत्र में बीसवीं सदी के प्रमुख विचारकों में जॉन रॉल्स (John Rawls) का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। वर्ष 1971 में उनकी प्रतिष्ठित कृति 'ए थ्योरी ऑफ जस्टिस' (A Theory of Justice) के प्रकाशन के बाद समकालीन राजनीतिक चिंतन में एक व्यापक वैचारिक बदलाव आया। रॉल्स ने न्याय को महज एक कानूनी या कोरी अवधारणा के रूप में देखने के बजाय "निष्पक्षता के रूप में न्याय" (Justice as Fairness) की अनूठी संकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया। वर्तमान युग के कल्याणकारी राष्ट्रों की नीतियां, सामाजिक सुरक्षा के प्रावधान और आर्थिक वितरण के मॉडल इसी दार्शनिक ताने-बाने पर टिके हुए हैं।

1. जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत की वैचारिक संरचना

रॉल्स ने अपने तर्कों को तार्किक रूप देने के लिए कुछ मौलिक वैचारिक उपकरणों का उपयोग किया है:

  • मूल स्थिति (Original Position): यह एक कल्पित और निष्पक्ष मंच है, जहां समाज की आधारशिला रखने वाले और उसके नियम-कानून तय करने वाले लोग एकत्र होते हैं।
  • अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance): यह रॉल्स के पूरे दर्शन का सबसे अहम बिंदु है। इसके तहत, मूल स्थिति में मौजूद किसी भी व्यक्ति को इस बात का बिल्कुल आभास नहीं होता कि भविष्य के समाज में उसकी व्यक्तिगत हैसियत क्या होगी—वह धनी बनेगा या निर्धन, अभिजात वर्ग से ताल्लुक रखेगा या वंचित तबके से, पुरुष होगा या महिला, अथवा किसी शारीरिक अक्षमता का सामना कर रहा होगा।
  • तर्कसंगत और निष्पक्ष चयन: जब निर्णय लेने वालों को अपने भविष्य के सामाजिक या आर्थिक स्तर का कोई पूर्वाग्रह नहीं होता, तो वे पूरी तरह निष्पक्ष होकर ऐसे नियमों का चयन करते हैं जो समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित और हितकारी हों।

2. न्याय के दो बुनियादी सिद्धांत

अज्ञानता के आवरण के पीछे छिपे हुए विवेकशील लोग जिन दो मुख्य सिद्धांतों पर अपनी सहमति जताते हैं, वे इस प्रकार हैं:

  • समान स्वतंत्रता का सिद्धांत (Principle of Equal Liberty): इसके अनुसार, प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और राजनीतिक अधिकारों जैसे बुनियादी क्षेत्रों में समान और सबसे व्यापक अधिकार मिलने चाहिए, जो सभी के लिए एक समान हों।
  • सामाजिक-आर्थिक असमानता का सिद्धांत (The Difference Principle & Fair Equality of Opportunity): रॉल्स यह भली-भांति समझते थे कि समाज में पूरी तरह की आर्थिक समानता व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। इसलिए, असमानताएं केवल तभी स्वीकार्य हो सकती हैं जब वे निम्नलिखित दो कसौटियों पर खरी उतरें:
    • अवसर की निष्पक्ष समानता: समाज के तमाम उच्च पद और रोजगार के अवसर बिना किसी पक्षपात के सभी नागरिकों के लिए समान रूप से उपलब्ध हों।
    • अंतर सिद्धांत (Difference Principle): धन या संसाधनों की असमानता तभी न्यायोचित है जब उससे समाज के सबसे कम संपन्न (Least Advantaged) वर्ग के लोगों के जीवन स्तर में अधिकतम सुधार सुनिश्चित होता हो।

3. आधुनिक कल्याणकारी राज्यों की नीतियों में रॉल्स के सिद्धांत की झलक (समकालीन उदाहरण)

आज के भूमंडलीकरण, मुक्त बाजार और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के दौर में भी आधुनिक सरकारों के सामने आर्थिक असमानता एक विकट समस्या है। इस परिदृश्य में रॉल्स का न्याय दर्शन अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होता है, जिसे निम्नलिखित समकालीन दृष्टांतों से समझा जा सकता है:

(क) प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता और लक्षित योजनाएं

कल्याणकारी राज्य रॉल्स के 'अंतर सिद्धांत' को जमीन पर उतारने के लिए सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का संचालन करते हैं।

  • उदाहरण: वर्तमान में भारत सहित दुनिया के कई विकासशील राष्ट्रों में महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, किसानों और बेरोजगार युवाओं के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) और मासिक वित्तीय सहायता जैसी योजनाएं चलाई जा रही हैं। ये कदम समाज के सबसे आखिरी व्यक्ति तक न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा पहुँचाने का कार्य करते हैं, जो सीधे तौर पर रॉल्स के न्याय के मानदंडों के अनुकूल हैं।

(ख) प्रगतिशील कर प्रणाली और संपदा का पुनर्वितरण

रॉल्स का यह स्पष्ट मत था कि मुक्त बाजार की प्रवृत्तियां अपने आप में न्यायपूर्ण नहीं होतीं, क्योंकि वे अकसर धन को कुछ गिने-चुने लोगों के हाथों में केंद्रित कर देती हैं।

  • उदाहरण: विश्वभर की आधुनिक लोकतांत्रिक सरकारें धनी कॉरपोरेट घरानों और उच्च आय वर्ग के लोगों पर प्रगतिशील कर (जैसे कॉरपोरेट टैक्स, सुपर-रिच टैक्स आदि) लगाती हैं। इस प्रकार करों से एकत्रित धनराशि का उपयोग मुफ्त खाद्यान्न वितरण, सार्वजनिक शिक्षा और सस्ते आवास जैसी कल्याणकारी योजनाओं पर किया जाता है। यह नीति रॉल्स के उस विचार का जीवंत उदाहरण है जिसमें आर्थिक असमानता का लाभ समाज के सबसे गरीब हिस्से तक पहुँचाया जाता है।

(ग) समावेशी विकास और सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण व विशेष अवसर)

रॉल्स का 'अवसर की निष्पक्ष समानता' का सिद्धांत इस बात पर बल देता है कि ऐतिहासिक या सामाजिक कारणों से जो वर्ग मुख्यधारा से पीछे छूट गए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने के लिए विशेष संरक्षण मिलना चाहिए।

  • उदाहरण: भारत के संदर्भ में, शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST), अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए निर्धारित आरक्षण की व्यवस्था तथा वंचित छात्रों के लिए विशेष छात्रवृत्तियां रॉल्स के 'फेयर इक्वलिटी ऑफ अपॉर्चुनिटी' के सिद्धांत को ही मजबूत करती हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि केवल सतही समानता पर्याप्त नहीं है, बल्कि पिछड़ों को बराबरी पर लाने के लिए विशेष सहयोग जरूरी है।

(घ) सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाएं और जन-कल्याण

  • उदाहरण: वैश्विक आपदाओं या महामारियों (जैसे कोविड-19) के दौरान सरकारों द्वारा नागरिकों के लिए मुफ्त टीकाकरण अभियान चलाना और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढाँचे के जरिए हर नागरिक के जीवन की रक्षा करना इस बात का प्रतीक है कि संकट के समय राज्य का सर्वोच्च कर्तव्य सबसे कमजोर व्यक्ति के प्राणों की सुरक्षा करना है। रॉल्स की 'मूल स्थिति' की परिकल्पना हमें यही सिखाती है कि एक न्यायप्रिय समाज वही है जो संकटकाल में अपने सबसे कमजोर नागरिक को अकेला नहीं छोड़ता।

निष्कर्ष

सार रूप में कहा जा सकता है कि जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत केवल पुस्तकीय या सैद्धांतिक बहसों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक कल्याणकारी और लोकतांत्रिक देशों की नीतियों के निर्धारण के लिए एक सशक्त नैतिक प्रकाश स्तंभ है। चाहे वह आर्थिक खाई को पाटने के लिए बनाई जाने वाली योजनाएं हों या सामाजिक समरसता स्थापित करने वाले कानून—रॉल्स का यह संदेश आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है कि एक आदर्श समाज वही है जो अपनी विकास यात्रा में किसी को पीछे न छोड़े और अपने सबसे कमजोर सदस्य के अधिकारों की पूरी हिफाजत करे।

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