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संयुक्त राष्ट्र और भारत का दृष्टिकोण

संयुक्त राष्ट्र (UN): वैश्विक प्रासंगिकता, चुनौतियां और भारत का दृष्टिकोण

द्वितीय विश्व युद्ध की तबाही के बाद 24 अक्टूबर 1945 को स्थापित संयुक्त राष्ट्र (UN) का मुख्य ध्येय भविष्य के वैश्विक संघर्षों को टालना, वैश्विक अमन-चैन कायम करना और मुल्कों के दरमियान आपसी तालमेल को बढ़ाना था। बीते आठ दशकों में इस वैश्विक संस्था ने कई बड़े मुकाम हासिल किए हैं, मगर मौजूदा बहुध्रुवीय (Multipolars) दौर में इसके वजूद और कार्यकुशलता को लेकर गहरे सवाल उठने लगे हैं।

1. मौजूदा वैश्विक परिदृश्य और यूएन की प्रासंगिकता

भले ही इस वैश्विक संस्था की कार्यशैली पर सवाल उठते रहे हों, लेकिन आज के तनावपूर्ण और जटिल दौर में भी संयुक्त राष्ट्र की मौजूदगी क्यों जरूरी है, इसे कुछेक मिसालों से समझा जा सकता है:

  • मानवीय और राहत कार्य: गाज़ा, सूडान और यूक्रेन जैसे अशांत क्षेत्रों के साथ-साथ प्राकृतिक आपदाओं के बीच यूएन के संगठन (जैसे WHO, UNHCR, WFP) लाखों बेघर और पीड़ित इंसानों तक जीवन रक्षक सहायता पहुंचाने का सबसे बड़ा और विश्वसनीय जरिया हैं।
  • ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज: आज विकासशील देश संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मंच के जरिए अपनी आर्थिक और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को दुनिया के सामने रख रहे हैं। इन्हीं मुल्कों के निरंतर दबाव का असर है कि अब वैश्विक मंचों पर गैर-बराबरी और जलवायु न्याय जैसे मुद्दों को नजरअंदाज करना नामुमकिन हो गया है।
  • भविष्य की तकनीक और नियमन: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल गवर्नेंस के इस आधुनिक दौर में, संयुक्त राष्ट्र ने इंसानों को केंद्र में रखकर डिजिटल नीतियों और वैश्विक संधियों के जरिए तकनीकी नियमों की रूपरेखा तैयार करनी शुरू कर दी है।

2. संयुक्त राष्ट्र के सामने खड़ी समकालीन और गंभीर चुनौतियां

आज की वैश्विक घटनाएं इस बात की गवाही देती हैं कि 1945 के खाके पर टिकी यह संस्था आधुनिक दुनिया की जमीनी हकीकत का मुकाबला करने में पिछड़ती जा रही है:

  • प्रमुख संघर्षों में कूटनीतिक ठहराव (Diplomatic Paralysis): रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य-पूर्व (गाज़ा व लेबनान) के संकट और सूडान के गृहयुद्ध को रोकने में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) पूरी तरह लाचार नजर आई है। सुरक्षा परिषद के भीतर महाशक्तियों की खींचतान के कारण कई प्रस्ताव या तो धरे रह जाते हैं या वीटो की भेंट चढ़ जाते हैं।
  • सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों का अटकाव: इस परिषद का ढांचा आज भी पुरानी औपनिवेशिक व्यवस्था और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शक्ति संतुलन की याद दिलाता है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान (G4 समूह) के साथ-साथ अफ्रीका का यह तर्क कि "1.4 अरब की आबादी वाले महाद्वीप या भारत को स्थायी सीट न मिलना सरासर नाइंसाफी है," लगातार मुखर होता जा रहा है। इसके बावजूद, अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पा रही है।
  • गंभीर वित्तीय और नकदी संकट: कई बड़े और छोटे सदस्य देशों द्वारा समय पर अपना जरूरी चंदा (Contributions) न दिए जाने के कारण यूएन को भारी बजट संकट का सामना करना पड़ रहा है। इससे इसके प्रशासनिक कामकाज और शांति अभियानों की रफ्तार धीमी पड़ रही है।
  • बहुपक्षवाद का कमजोर होना: दुनिया भर में सिर उठा रहे संकीर्ण राष्ट्रवाद और 'पहले मेरा देश' जैसी नीतियों के कारण मुल्क वैश्विक समझौतों से मुंह मोड़ रहे हैं, जिससे सामूहिक सुरक्षा की भावना को तगड़ा झटका लगा है।

3. संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर भारत का दृष्टिकोण

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और जनसंख्या के लिहाज से अग्रणी देश होने के नाते संयुक्त राष्ट्र में सुधारों का मुखर पैरोकार रहा है। भारत के दृष्टिकोण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और 'सुधारित बहुपक्षवाद' (Reformed Multilateralism): भारत का स्पष्ट मानना है कि यदि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटना है, तो सुरक्षा परिषद में व्यापक बदलाव करना होगा। 1945 की भू-राजनीति पर आधारित यह संस्था आज की वास्तविक बहुध्रुवीय दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती। भारत, G4 देशों के माध्यम से UNSC में स्थायी और अस्थायी दोनों श्रेणियों के विस्तार की पुरजोर वकालत करता है ताकि विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ को उचित हिस्सेदारी मिल सके।
  • आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस: भारत ने लगातार वैश्विक मंचों पर सीमा पार आतंकवाद (Cross-border Terrorism) और इसे पनाह देने वाले देशों के दोहरे चरित्र को बेनकाब किया है। भारत का रुख रहा है कि जब तक यूएन आतंकवाद को परिभाषित करने और इसके खिलाफ ठोस व एकजुट वैश्विक कार्रवाई करने में नाकाम रहेगा, तब तक वैश्विक शांति और सुरक्षा अधूरी है।
  • शांति स्थापना अभियानों में अग्रणी भूमिका: दशकों से भारत ने यूएन के शांति स्थापना मिशनों (UN Peacekeeping Missions) में सबसे ज्यादा सैनिक भेजने वाले देशों में प्रमुख स्थान रखा है। कई भारतीय सैनिकों ने वैश्विक शांति के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया है, जो यूएन के आदर्शों के प्रति भारत की अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • ग्लोबल साउथ के हितों की पैरवी: भारत ने हमेशा से एशिया, अफ्रीका और लाैटिन अमेरिका के विकासशील देशों की आवाज बनकर संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन, तकनीक तक पहुंच और निष्पक्ष वैश्विक वित्तीय सुधारों (जैसे IMF और विश्व बैंक में बदलाव) की मांग को बुलंद किया है।

4. निष्कर्ष और आगे की राह

जैसा कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अक्सर कहा जाता है— "संयुक्त राष्ट्र का गठन दुनिया की समस्याओं पर केवल चर्चा करने के लिए नहीं हुआ था, बल्कि उनका हल ढूंढने के लिए हुआ था।"

आज जरूरत इस बात की है कि वैश्विक नेता अपने छोटे भू-राजनीतिक फायदों को दरकिनार करें और भारत द्वारा समर्थित 'सुधारित बहुपक्षवाद' (Reformed Multilateralism) के रास्ते पर चलें। जब तक सुरक्षा परिषद जैसी प्रमुख संस्थाएं समकालीन वास्तविकताओं और भारत जैसे प्रमुख लोकतांत्रिक देशों को प्रतिनिधित्व नहीं देतीं, तब तक वैश्विक शांति और न्याय का सपना अधूरा ही रहेगा। जलवायु बदलाव, आतंकवाद और महामारियों जैसी विपदाओं से निपटने के लिए एक मजबूत, पारदर्शी और समावेशी संयुक्त राष्ट्र ही एकमात्र विकल्प है।

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