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भारत - चीन कूटनीतिक संबंध



भारत-चीन कूटनीतिक संबंध: ऐतिहासिक विकास, समकालीन विदेश नीति और भू-राजनीतिक चुनौतियाँ

भारत और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना (PRC) के बीच कूटनीतिक संबंधों की स्थापना 1 अप्रैल 1950 को हुई थी। भारत उन शुरुआती गैर-साम्यवादी देशों में शामिल था जिन्होंने 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के बाद चीन गणराज्य को मान्यता दी थी। पिछले सात दशकों में दोनों एशियाई दिग्गजों के संबंध 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' के नारे से शुरू होकर सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और आर्थिक अंतर्निर्भरता के एक जटिल दौर से गुजरे हैं।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 'पंचशील' का सिद्धांत

1950 के दशक के शुरुआती वर्षों में दोनों देशों के बीच संबंधों की नींव शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पांच सिद्धांतों (पंचशील) पर रखी गई थी, जिन पर 29 अप्रैल 1954 को हस्ताक्षर किए गए थे।

  • एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान करना।

  • अनाक्रमण और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।

  • समानता और पारस्परिक लाभ तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

हालांकि, तिब्बत के राजनीतिक दर्जे और सीमा निर्धारण (विशेषकर अक्साई चिन और मैकमोहन रेखा) को लेकर मतभेद बढ़ते गए, जिसके परिणामस्वरूप 1958-1962 का सीमा संघर्ष हुआ। इस युद्ध ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक विश्वास को गहरी चोट पहुँचाई और संबंधों में एक लंबा शीतकाल शुरू हो गया।

2. संबंधों का पुनरुद्धार और आर्थिक आयाम (1988–2008)

द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिसंबर 1988 में आया, जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बीजिंग की ऐतिहासिक यात्रा की। इस यात्रा के दौरान सीमा विवाद के अंतिम समाधान तक सीमा पर शांति बनाए रखने और अन्य क्षेत्रों (व्यापार, संस्कृति और कूटनीति) में सहयोग जारी रखने पर सहमति बनी।

  • आर्थिक साझेदारी: 21वीं सदी के पहले दशक में व्यापार दोनों देशों के संबंधों का सबसे मजबूत स्तंभ बनकर उभरा। चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना, जिसमें भारत से कच्चे माल (लौह अयस्क आदि) का निर्यात और चीन से इलेक्ट्रॉनिक व औद्योगिक वस्तुओं का आयात प्रमुख रहा।

  • बहुपक्षीय मंच: दोनों देशों ने ब्रिक्स (BRICS), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और जी-20 जैसे वैश्विक मंचों पर जलवायु परिवर्तन, विकासशील देशों के अधिकार और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के निर्माण जैसे मुद्दों पर अक्सर एक साझा रुख अपनाया।

3. समकालीन विदेश नीति और रणनीतिक तनाव

पिछले एक दशक में, विशेष रूप से पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी संघर्ष (2020) के बाद, भारत-चीन संबंधों में एक नया और कठोर रणनीतिक यथार्थवाद (Strategic Realism) देखा गया है। वर्तमान विदेश नीति निम्नलिखित प्रमुख आयामों पर केंद्रित है:

क. संप्रभुता और सीमा सुरक्षा (Border Sovereignty)

भारत की वर्तमान विदेश नीति का मूल मंत्र स्पष्ट हो चुका है कि "सीमा पर शांति और स्थिरता के बिना द्विपक्षीय संबंधों में सामान्यता संभव नहीं है।" पैंगोंग त्सो, गलवान और डेपसांग जैसे क्षेत्रों में गतिरोध ने भारत को अपनी सैन्य अवसंरचना (Infrastructure) को मजबूत करने और चीन के साथ लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सतर्कता बढ़ाने के लिए मजबूर किया है।

ख. आर्थिक पुनर्गठन और 'आत्मनिर्भर भारत'

राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता को ध्यान में रखते हुए, भारत सरकार ने चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, कई चीनी मोबाइल ऐप्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को प्रतिबंधित किया है, और रणनीतिक क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए 'आत्मनिर्भर भारत' तथा पीएलआई (PLI) योजनाओं को लागू किया है।

ग. हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक कूटनीति

चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' रणनीति (जैसे पाकिस्तान में ग्वादर और श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का विकास) के जवाब में भारत ने अपनी नौसैनिक क्षमताओं का विस्तार किया है। भारत अब क्वाड (QUAD) - यानी अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के गठबंधन - का एक सक्रिय सदस्य है, जिसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को मुक्त, खुला और समावेशੀ बनाए रखना है।

4. वैश्विक मंचों पर रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy)

एक ओर जहाँ दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय स्तर पर तनाव और अविश्वास का माहौल है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक शासन और बहुपक्षवाद के मुद्दों पर भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है।

  • ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत और चीन दोनों ही विकासशील देशों के हितों की पैरवी करते हैं। जलवायु परिवर्तन वार्ता में 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' (CBDR) के सिद्धांत पर दोनों का दृष्टिकोण काफी हद तक समान रहा है।

  • बहुध्रुवीय एशिया: भारत एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का पक्षधर है जहाँ कोई एक देश (विशेषकर चीन) एशिया में आधिपत्य स्थापित न कर सके। भारत की नीति 'कंटेनमेंट' (घेरने) की बजाय 'बैलेंसिंग' (संतुलन बनाने) की है।

निष्कर्ष

पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के साथ भारत के कूटनीतिक संबंध आज एक बेहद नाजुक और संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि एशिया की शांति और समृद्धि काफी हद तक दिल्ली और बीजिंग के आपसी तालमेल पर निर्भर करती है। आज की विदेश नीति का मूल मंत्र "सहयोग, प्रतिस्पर्धा और दृढ़ विरोध" (Cooperate, Compete, and Contest) बन गया है। भारत एक तरफ अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता न करते हुए चीन के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संवाद बनाए रखे हुए है, तो दूसरी तरफ वैश्विक मंच पर अपनी स्वतंत्र और मजबूत पहचान स्थापित कर रहा है।


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