न्यायिक सक्रियता और न्यायपालिका की भूमिका: हाल के फैसलों के विशेष संदर्भ में
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में संविधान को सर्वोच्च माना जाता है, तथा उसकी रक्षा और सही व्याख्या करने का उत्तरदायित्व स्वतंत्र न्यायपालिका को सौंपा गया है। भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) का सिद्धांत निहित है, जिसके तहत विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका उनकी समीक्षा करती है। हालांकि, समय-समय पर जब कार्यपालिका या विधायिका अपने संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन में विफल होती हैं या जनहित की उपेक्षा करती हैं, तब न्यायपालिका एक संरक्षक के रूप में आगे आती है। इसे ही न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कहा जाता है।
1. न्यायिक सक्रियता का उद्गम और इसका विस्तृत अर्थ
न्यायिक सक्रियता का तात्पर्य न्यायपालिका द्वारा केवल पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी या मुकदमों तक सीमित दृष्टिकोण को त्यागकर, समाज के व्यापक हितों में सकारात्मक और मार्गदर्शक भूमिका निभाने से है।
- जनहित याचिका (PIL) की क्रांति: भारत में 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के शुरुआती दौर में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर और न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने 'लोक हित वाद' (Public Interest Litigation) की नींव रखी। इसके तहत किसी भी पीड़ित व्यक्ति या सामाजिक संस्था द्वारा समाज के शोषित, वंचित और बेसहारा वर्ग के अधिकारों के लिए सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की अनुमति दी गई।
- संवैधानिक प्रावधानों का विस्तार: न्यायपालिका ने अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के दायरे को व्यापक बनाते हुए इसमें शिक्षा का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, आजीविका, स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकारों को शामिल किया है।
2. हाल के प्रमुख फैसले और प्रासंगिक उदाहरण (Case Studies)
हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने कई ऐतिहासिक और दूरगामी निर्णय दिए हैं, जो न्यायिक सक्रियता और उसके गहरे सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव को दर्शाते हैं:
क. चुनावी बॉन्ड योजना (Electoral Bonds Scheme) और राजनीतिक पारदर्शिता
- मामला: एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ (2024)
- विवरण: सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले अज्ञात चंदे से जुड़ी 'चुनावी बॉन्ड योजना' को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के वित्तपोषण (Funding) के स्रोतों के बारे में जानने का अधिकार है, जो संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत 'वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' और 'सूचना के अधिकार' का अनिवार्य हिस्सा है। यह फैसला चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की दिशा में न्यायिक सक्रियता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
ख. व्यक्तिगत स्वतंत्रता और UAPA के दुरुपयोग पर लगाम
- मामला: प्रबीर पुरकायस्थ बनाम एनसीटी दिल्ली (2024)
- विवरण: समाचार पोर्टल 'न्यूजक्लिक' के संस्थापक से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी कि गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (UAPA) या किसी भी अन्य कठोर कानून के तहत गिरफ्तार किए जाने पर आरोपी को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में दिए जाने चाहिए। अदालत ने कहा कि व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) सर्वोपरि है और केवल मौखिक रूप से कारण बताना कानून की नजर में पर्याप्त नहीं है, जिससे पुलिस या जांच एजेंसियों की मनमानी पर रोक लगी है।
ग. जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय अधिकार
- मामला: मीता दास गुप्ता बनाम पश्चिम बंगाल राज्य एवं अन्य (2024) तथा पूर्ववर्ती हरित न्याय के निर्णय
- विवरण: सर्वोच्च न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को गंभीरता से लेते हुए यह रेखांकित किया कि नागरिकों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त रहने और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार है। अदालत ने माना कि यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत निहित मौलिक अधिकारों का एक अभिन्न अंग है।
घ. लैंगिक समानता और कार्यस्थल पर सुरक्षा
- मामला: हाल ही में न्यायपालिका द्वारा कार्यस्थलों पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (POSH Act) के कड़ाई से पालन और लैंगिक अल्पसंख्यकों (Transgender Rights) के सामाजिक समावेशन को लेकर दिए गए दिशा-निर्देश।
- विवरण: अदालतों ने यह सुनिश्चित किया है कि कानून के क्रियान्वयन में हीला-हवाली न हो और हाशिए के समुदायों को समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान मिले।
3. न्यायिक सक्रियता के सकारात्मक और नकारात्मक पहलू
सकारात्मक पहलू (Judicial Positives):
- मानवाधिकारों का संरक्षण: समाज के सबसे कमजोर वर्ग, जिन्हें पारंपरिक कानूनी प्रक्रिया का लाभ नहीं मिल पाता था, उन्हें न्याय मिला है।
- कार्यपालिका की जवाबदेही: इससे भ्रष्टाचार, मानवाधिकार हनन और प्रशासनिक उदासीनता पर अंकुश लगता है।
- कानूनी शून्यता को भरना: संसद में किसी विषय पर कानून के अभाव में न्यायालय द्वारा जारी दिशा-निर्देश (जैसे महिलाओं की सुरक्षा पर विशाखा गाइडलाइंस) समाज को दिशा देते हैं।
आलोचनात्मक दृष्टिकोण एवं 'न्यायिक अतिरेक' (Judicial Overreach) का खतरा:
- शक्तियों के पृथक्करण का उल्लंघन: आलोचकों और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब न्यायपालिका नीति-निर्माण या प्रशासनिक कार्यों में अत्यधिक हस्तक्षेप करने लगती है, तो इसे 'न्यायिक अतिरेक' कहा जाता है, जो लोकतंत्र के मूल ढांचे (शक्तियों के संतुलन) को प्रभावित करता है।
- संसाधनों की अनदेखी: कई बार अदालतें ऐसे निर्देश दे देती हैं जिनके क्रियान्वयन के लिए सरकार के पास वित्तीय या ढांचागत संसाधन सीमित होते हैं।
- लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का अभाव: न्यायाधीश जनता द्वारा निर्वाचित नहीं होते, इसलिए सार्वजनिक नीतियों के निर्धारण में उनकी असीमित भूमिका को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व की कसौटी पर परखा जाता है।
4. निष्कर्ष
न्यायिक सक्रियता भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और उसकी जीवंतता का प्रतीक है। यह लोकतंत्र के रक्षक के रूप में न्यायपालिका की अनिवार्यता को सिद्ध करती है। हालांकि, संतुलन बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि न्यायिक सक्रियता 'न्यायिक अतिरेक' में न बदले। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका—तीनों अंगों को संविधान के दायरे में रहकर, 'संयोजन और संतुलन' (Checks and Balances) के सिद्धांत के साथ देश के विकास और नागरिकों के कल्याण के लिए सहयोगात्मक रूप से कार्य करना चाहिए।
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