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आधुनिक भू - राजनीति और भारत

आधुनिक भू-राजनीति में भारत का कूटनीतिक रुख: रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण

वैश्विक परिवेश में आज अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहे हैं। एक समय ऐसा था जब दुनिया दो महाशक्तियों के बीच बंटी हुई थी, लेकिन अब एकल-ध्रुवीय व्यवस्था का प्रभाव समाप्त हो चुका है। वर्तमान समय पूरी तरह बहु-ध्रुवीयता की ओर अग्रसर है। एक तरफ अमेरिका और चीन के मध्य बढ़ती तनातनी, तो दूसरी तरफ पूर्वी यूरोप और मध्य पूर्व के अशांत क्षेत्र, वैश्विक आपूर्ति प्रणालियों के समक्ष चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। इन तमाम उथल-पुथल के बीच भारत की विदेश नीति एक अत्यंत सशक्त और निर्णायक दौर से गुजर रही है।

आज का भारत वैश्विक राजनीति में केवल एक दर्शक या प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय एजेंडे को प्रभावित करने वाला एक मजबूत केंद्र बन चुका है। आइए समकालीन परिदृश्य और व्यावहारिक मिसालों के आधार पर उन मूल आधारों को समझें जिन पर देश की मौजूदा कूटनीति टिकी हुई है।

1. रणनीतिक स्वतंत्रता और बहु-पक्षीय जुड़ाव

शीत युद्ध के दौर में भारत ने गुटनिरपेक्षता के रास्ते पर चलते हुए सैन्य गठबंधनों से दूरी बनाए रखी थी। हालांकि, आज के समय में वही नीति अधिक परिपक्व होकर बहु-पक्षीय जुड़ाव (Multi-Alignment) का रूप ले चुकी है।

  • विरोधी विचारधाराओं के साथ तालमेल: यह भारत की अनूठी कूटनीति का ही परिणाम है कि वह एक तरफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा गठबंधन 'क्वाड' का मुख्य हिस्सा है, तो दूसरी तरफ रूस और चीन के प्रभाव वाले मंचों जैसे 'ब्रिक्स' और 'शंघाई सहयोग संगठन' का भी सक्रिय सदस्य है।
  • ताजा मिसाल: यूरोपीय संघर्ष और उसके बाद पश्चिमी मुल्कों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद, भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। बाहरी दबावों से अप्रभावित रहते हुए देश ने रियायती दरों पर रूसी ऊर्जा का आयात जारी रखा, जबकि साथ ही अमेरिका के साथ अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों और 'आई-सैट' जैसे समझौतों को भी गति दी। यह इसी बहु-पक्षीय संतुलन का जीवंत प्रमाण है।

2. यथार्थवादी दृष्टिकोण और व्यावहारिक कूटनीति

भारतीय विदेश नीति अब केवल कोरे आदर्शवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जमीन पर मौजूद कड़वी सच्चाइयों और यथार्थवाद (Realism) पर पूरी तरह आधारित है।

  • राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: कूटनीतिक गलियारों में इसे रणनीतिक स्पष्टता के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए, सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव के बावजूद चीन के साथ आर्थिक और व्यावसायिक आवश्यकताएं अपनी जगह बनी हुई हैं, और दूसरी ओर हिंद महासागर तथा इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी स्थिति सुरक्षित रखने के लिए कड़े कदम भी उठाए जा रहे हैं।
  • ताजा मिसाल: पश्चिम एशिया के संकट के दौरान देश ने आतंकवाद के खिलाफ इजराइल के पक्ष का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए बड़े पैमाने पर मानवीय सहायता सामग्री भी भेजी। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि भारत हर घटना का मूल्यांकन अपने राष्ट्रीय हितों और मानवीय मूल्यों के आधार पर स्वतंत्र रूप से करता है, किसी बाहरी दबाव के कारण नहीं।

3. आर्थिक कूटनीति और संसाधनों का विविधीकरण

आज की कूटनीति का एक और महत्वपूर्ण स्तंभ किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता को खत्म करना और आर्थिक व तकनीकी साझेदारी को व्यापक बनाना है।

  • रक्षा और तकनीक का फैलाव: अब देश सैन्य साजो-सामान के लिए किसी एक भागीदार पर निर्भर नहीं रहा। भारतीय सशस्त्र बलों के बेड़े में जहां एक तरफ रूसी उपकरण हैं, वहीं फ्रांस के लड़ाकू विमान और अमेरिका के साथ हुए ड्रोन सौदे भी शामिल हैं।
  • ताजा मिसाल: सरकार अपनी डिजिटल भुगतान प्रणालियों (UPI) और 'इंडिया स्टैक' जैसे नवाचारों को वैश्विक दक्षिण के कई देशों तक पहुंचा रही है। सिंगापुर, यूएई, और फ्रांस जैसे राष्ट्रों में इस तकनीक का उपयोग इस बात को दर्शाता है कि भारत तकनीकी शक्ति के माध्यम से अपनी साख और प्रभाव को लगातार बढ़ा रहा है।

4. वैश्विक दक्षिण की सशक्त आवाज़ और सुधारों की मांग

भारत खुद को विकासशील तथा वंचित देशों—जिन्हें सामूहिक रूप से 'ग्लोबल साउथ' कहा जाता है—का स्वाभाविक अगुआ मानता है।

  • अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पैरवी: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आवश्यक बदलाव, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की मजबूत हिस्सेदारी और आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया को एक मंच पर लाने के लिए भारत ने हमेशा मुखर भूमिका निभाई है।
  • ताजा मिसाल: देश की अध्यक्षता में संपन्न हुआ जी-20 शिखर सम्मेलन इसका सबसे बड़ा गवाह है, जहां 'एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य' के मूल मंत्र के साथ अफ्रीकी महाद्वीप के संघ को इस समूह की स्थायी सदस्यता दिलाई गई। इसने यह साबित कर दिया कि भारत वैश्विक मंचों पर छोटे और विकासशील राष्ट्रों के हितों को सबसे आगे रखता है।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहा जाए तो, वर्तमान भू-राजनीति में भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता, बहु-पक्षीय संतुलन और राष्ट्र-हित आधारित यथार्थवाद की त्रिपक्षीय नींव पर खड़ी है। आज भारत अंतरराष्ट्रीय पटल पर केवल एक मध्यस्थ शक्ति नहीं रहा, बल्कि वैश्विक नियमों और भविष्य की दिशा तय करने वाली एक प्रमुख धुरी बन चुका है।

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