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भारतीय विदेश नीति का विकास

भारतीय विदेश नीति का विकास: निरंतरता और परिवर्तन - आदर्शवाद से सामरिक यथार्थवाद तक

भारतीय विदेश नीति एक जीवंत, गतिशील और विकासशील प्रक्रिया है, जो पिछले सात दशकों से अधिक समय से वैश्विक परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से लेकर आज तक, भारत की विदेश नीति ने निरंतरता (Continuity) और परिवर्तन (Change) के एक अनूठे संतुलन को दर्शाया है।

यदि हम इसके सफर पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि कैसे भारत अपनी प्राचीन सभ्यतागत और नैतिक प्राथमिकताओं से आगे बढ़कर समकालीन भू-राजनीति की यथार्थवादी और व्यावहारिक वास्तविकताओं को अपना रहा है। आइए, इस वैचारिक विकास के विभिन्न पहलुओं और चरणों को विस्तार से समझें।

1. आदर्शवाद और गुटनिरपेक्षता का दौर (1947–1962): पंचशील और नैतिक कूटनीति

आजादी के तुरंत बाद, देश के पहले प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय विदेश नीति की नींव रखी। इस शुरुआती दौर में आदर्शवाद (Idealism), नैतिक मूल्यों और अंतर्राष्ट्रीय शांति की गूंज स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी।

  • गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM): शीत युद्ध के दौरान जब दुनिया दो ध्रुवों (अमेरिका और सोवियत संघ) में बंट रही थी, तब भारत ने किसी भी सैन्य गुट में शामिल न होने का स्वतंत्र मार्ग चुना। इसे गुटनिरपेक्षता कहा गया, जिसका उद्देश्य देश की रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखना था।

  • पंचशील के सिद्धांत: 1954 में भारत और चीन के बीच हुए समझौतों में 'पंचशील' के सिद्धांतों (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, और आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप) को प्रतिपादित किया गया।

  • वैश्विक शांति: इस कालखंड में भारत ने वैश्विक मंचों पर उपनिवेशवाद का विरोध किया और विश्व शांति व निरस्त्रीकरण की जोरदार वकालत की।

2. यथार्थवाद की पहली दस्तक: सुरक्षा और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि (1962–1990)

आदर्शवादी सिद्धांतों को उस समय करारा झटका लगा जब 1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत को पराजय का सामना करना पड़ा। इस घटना ने देश के नीति-निर्माताओं को यह अहसास कराया कि केवल नैतिक आदर्शों और सद्भावना के बल पर राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता।

  • कड़े सामरिक निर्णय: इसके बाद, भारत की विदेश नीति में धीरे-धीरे यथार्थवादी पुट आने लगा। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान सोवियत संघ के साथ 'शांति, मित्रता और सहयोग की संधि' पर हस्ताक्षर करना इस बात का प्रमाण था कि भारत अब रणनीतिक समझौतों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को महत्व देने लगा था।

  • परमाणु क्षमता का विकास: अपनी संप्रभुता और सुरक्षा को अटूट बनाए रखने के लिए, भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण (ऑपरेशन स्माइलिंग बुद्धा) करके अपनी तकनीकी और सामरिक शक्ति का परिचय दिया।

3. उदारीकरण और रणनीतिक लचीलापन (1991–2014): बहु-ध्रुवीय दुनिया की शुरुआत

1991 का वर्ष भारतीय इतिहास और अर्थव्यवस्था के साथ-साथ विदेश नीति के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हुआ। सोवियत संघ के विघटन और गंभीर आर्थिक संकट के बीच भारत ने खुद को वैश्विक व्यवस्था के सांचे में ढाला।

  • लुक ईस्ट पॉलिसी (Look East Policy): दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों (ASEAN) के साथ आर्थिक और सामरिक संबंधों को मजबूत करने के लिए इस नीति का सूत्रपात किया गया।

  • आर्थिक कूटनीति: प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव और बाद के प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में विदेश नीति का केंद्र बिंदु भू-राजनीति से हटकर भू-अर्थशास्त्र (Geo-economics) की ओर भी मुड़ा।

  • परमाणु शक्ति की औपचारिक घोषणा: 1998 के पोखरण-2 परमाणु परीक्षणों ने भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, और इसके बावजूद अमेरिका सहित प्रमुख पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंधों में कड़वाहट के बजाय नजदीकी बढ़ती गई।

4. समकालीन युग: सामरिक यथार्थवाद और 'एक्ट ईस्ट' से 'ग्लोबल साउथ' तक (2014 से वर्तमान)

वर्तमान समय में भारतीय विदेश नीति सामरिक यथार्थवाद (Strategic Realism) और बहु-संरेखण (Multi-alignment) के सिद्धांत पर मजबूती से खड़ी है। आज भारत किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय हर प्रमुख वैश्विक शक्ति के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर संबंध बना रहा है।

  • क्वाड (QUAD) और हिंद-प्रशांत नीति: इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए भारत ने अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर 'क्वाड' का गठन किया है, जो यथार्थवादी कूटनीति का स्पष्ट उदाहरण है।

  • ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विकासशील देशों (Global South) का नेतृत्व किया है। जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे मुद्दों पर भारत ग्लोबल साउथ की मुख्य आवाज बनकर उभरा है।

  • स्वयं पर निर्भरता (आत्मनिर्भर भारत) और कूटनीतिक स्वायत्तता: रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया के तनावों के बीच भी भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों (जैसे रियायती दरों पर ऊर्जा आयात) को सर्वोपरि रखते हुए पश्चिमी दबाव के आगे झुके बिना पूरी दृढ़ता से अपनी सामरिक स्वायत्तता को बनाए रखा है।

निष्कर्ष: संतुलन ही भारत की असली ताकत

भारतीय विदेश नीति का विकास एक ऐसी यात्रा है जिसमें "वसुधैव कुटुंबकम्" (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) के प्राचीन भारतीय आदर्शवाद और कौटिल्य के यथार्थवाद का बेहतरीन समन्वय देखने को मिलता है।

निरंतरता के स्तर पर भारत ने अपनी शांतिप्रियता, गुटनिरपेक्षता की मूल भावना (अब बहु-संरेखण के रूप में) और स्वतंत्र विदेश नीति को बनाए रखा है; वहीं परिवर्तन के स्तर पर उसने वैश्विक मंच पर अपनी आर्थिक, तकनीकी और सैन्य ताकत के बूते पर एक मुखर, आश्वस्त और आक्रामक रूप से अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाले राष्ट्र का रूप ले लिया है। यही यथार्थवादी बदलाव आज के नए भारत को वैश्विक व्यवस्था का एक अनिवार्य स्तंभ बनाता है।

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