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ब्रिक्स और भारत


 ब्रिक्स और वैश्विक कूटनीति में भारत की भूमिका: एक बहुध्रुवीय विश्व की ओर बढ़ता कदम

परिचय

आज के समय में अंतरराष्ट्रीय राजनीति और भू-राजनीति (Geopolitics) एक बेहद दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। पारंपरिक पश्चिमी देशों का वर्चस्व अब धीरे-धीरे कम हो रहा है और दुनिया एक बहुध्रुवीय (Multipolar) व्यवस्था की तरफ बढ़ चली है। इस वैश्विक बदलाव के केंद्र में ब्रिक्स (BRICS) एक बेहद ताकतवर मंच बनकर उभरा है। यह संगठन दुनिया की आधी आबादी और एक तिहाई से ज्यादा अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हुए 'वैश्विक दक्षिण' (Global South) की आवाज को दुनिया के सामने पुरजोर तरीके से रख रहा है।

शुरुआत में यह केवल उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का एक आर्थिक संगठन मात्र था, लेकिन आज यह वैश्विक शासन, सुरक्षा और कूटनीति का एक अनिवार्य स्तंभ बन चुका है। इस पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका न केवल रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही है, बल्कि इसने दुनिया को एक संतुलित और मानवता-केंद्रित दृष्टिकोण भी प्रदान किया है।

ब्रिक्स का बदलता स्वरूप और इसका महत्व

अब ब्रिक्स केवल पांच शुरुआती देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) तक ही सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में इसके विस्तार और नए सदस्य देशों के जुड़ने से इसका फलक वैश्विक स्तर पर काफी बड़ा हो चुका है।

  • वैकल्पिक वित्तीय ताकत: यह मंच पश्चिमी देशों के दबदबे वाले वित्तीय संस्थानों (जैसे आईएमएफ और विश्व बैंक) के समानांतर 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) के जरिए विकासशील देशों को वित्तीय मदद का एक बेहतरीन विकल्प देता है।
  • स्थानीय मुद्राओं में व्यापार: अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने और अपनी आर्थिक संप्रभुता को मजबूत बनाने के लिए ब्रिक्स देश अब आपसी कारोबार में अपनी स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहे हैं।

समकालीन कूटनीतिक परिदृश्य: भारत की कमान और नई दिशा

भारत ने ब्रिक्स मंच पर हमेशा एक अगुआ की भूमिका निभाई है। जब-जब भारत ने इस समूह की प्राथमिकताओं को दिशा दी है, तब-तब वैश्विक मंच पर देश की नेतृत्व क्षमता और मजबूत हुई है। वर्तमान कूटनीति में भारत के योगदान को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  1. 'वसुधैव कुटुंबकम्' और 'मानवता सर्वोपरि' का विजन: भारत ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि वैश्विक विकास की नीतियां केवल कुछ चुनिंदा विकसित देशों के नजरिए से न तय हों, बल्कि विकासशील दुनिया की जमीनी जरूरतों को उसमें प्राथमिकता मिले।
  2. डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) का नेतृत्व: भारत ने अपने तकनीकी सफर—जैसे आधार, यूपीआई (UPI) और इंडिया स्टैक जैसी डिजिटल सफलताओं—को ब्रिक्स देशों के साथ साझा करने की मजबूत पहल की है। इससे फिनटेक और डिजिटल समावेशन के क्षेत्र में आपसी सहयोग को नई रफ्तार मिली है।
  3. पर्यावरण और 'ग्लोबल साउथ' के अधिकारों की पैरवी: जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, और ग्रीन फाइनेंस जैसे गंभीर मुद्दों पर भारत ने हमेशा विकासशील देशों का पक्ष मजबूती से रखा है। भारत की पहल पर शुरू किए गए नए कार्य-तंत्र पर्यावरण और सतत विकास के प्रति देश की प्रतिबद्धता को उजागर करते हैं।
  4. रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का संतुलन: भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी खासियत यह है कि उसने ब्रिक्स को कभी भी किसी पश्चिमी विरोधी ('Anti-West') गुट के रूप में नहीं ढलने दिया। भारत एक तरफ पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों (जैसे क्वाड) को मजबूत करता है, तो दूसरी तरफ ब्रिक्स मंच पर विकासशील देशों के हितों के लिए पूरी दृढ़ता से खड़ा रहता है।
  5. आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति: भारत ने आतंकवाद के मुद्दे पर कभी समझौता नहीं किया। ब्रिक्स के मंच का इस्तेमाल करते हुए भारत ने हमेशा सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहमति बनाने और सुरक्षा सहयोग को पुख्ता करने में अहम भूमिका निभाई है।

भारत के सामने आने वाली चुनौतियां

इन तमाम बड़ी सफलताओं के बावजूद, आज के कूटनीतिक माहौल में भारत के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं:

  • आंतरिक संतुलन और चीन का प्रभाव: संगठन के भीतर चीन की बड़ी आर्थिक और राजनीतिक ताकत एक चुनौती है। भारत को यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि कोई भी देश इस मंच का इस्तेमाल अपने निजी भू-राजनीतिक स्वार्थों के लिए न कर सके।
  • विस्तार के बाद सर्वसम्मति बनाना: नए सदस्यों के जुड़ने से संगठन का दायरा तो बढ़ा है, लेकिन अलग-अलग हितों वाले इतने सारे देशों के बीच किसी एक बात पर आम सहमति बनाना अब पहले से अधिक कठिन हो गया है।

निष्कर्ष

आज के दौर में ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की एक बेहद अहम 'संतुलनकारी शक्ति' बन चुका है। इस पूरे ढांचे में भारत की स्थिति एक मजबूत और भरोसेमंद 'सेतु' (Bridge) जैसी है, जो विकसित और विकासशील दुनिया के बीच संवाद कायम रखती है। भारत की यह दूरदर्शी और परिपक्व कूटनीति न केवल ब्रिक्स को प्रासंगिक बनाए रख रही है, बल्कि एक न्यायसंगत, शांतिपूर्ण और बहुध्रुवीय विश्व के निर्माण में भी एक मील का पत्थर साबित हो रही है ।

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