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पर्यावरणीय राजनीति और जलवायु न्यायः

पर्यावरणीय राजनीति और जलवायु न्याय: CBDR के सिद्धांत पर भारत का रुख

ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) आज पूरी मानवता के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का यह मुख्य पटल बन गया है कि इस संकट के लिए आखिर किसकी जवाबदेही कितनी है। इस पूरी बहस के केंद्र में कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटीज (CBDR - Common But Differentiated Responsibilities) का ऐतिहासिक सिद्धांत खड़ा है।

यह ब्लॉग इस बात का विश्लेषण करता है कि जलवायु न्याय (Climate Justice) की इस अवधारणा के आलोक में भारत का क्या रुख रहा है और वैश्विक मंचों पर देश किस प्रकार अपने राष्ट्रीय विकास और पर्यावरणीय हितों का संतुलन साध रहा है।

1. CBDR सिद्धांत और जलवायु न्याय का मूल अर्थ

CBDR का स्पष्ट अर्थ है कि वैश्विक पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी 'साझा तो है, लेकिन सबकी भूमिका अलग-अलग (विभेदीकृत) है।'

  • ऐतिहासिक जिम्मेदारी (Historical Responsibility): विकसित देशों (जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय देश) ने पिछले 150 से अधिक वर्षों से औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडल में सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसों (GHGs) का उत्सर्जन किया है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग के मुख्य जिम्मेदार वे ही हैं।
  • विकासशील देशों की बाध्यता: इसके विपरीत, भारत और अन्य विकासशील देशों ने हाल के दशकों में विकास करना शुरू किया है। उनकी प्राथमिकताएं गरीबी उन्मूलन, बुनियादी ढांचा विकास और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

जलवायु न्याय (Climate Justice) मांग करता है कि जिन देशों ने संकट पैदा किया है, वे ज्यादा बोझ उठाएं और विकासशील देशों को स्वच्छ तकनीक व वित्तीय सहायता प्रदान करें।

2. भारत का रुख: मुख्य बिंदु और आधिकारिक आंकड़े

भारत वैश्विक जलवायु वार्ताओं में हमेशा से CBDR-RC (Common But Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities) का प्रबल समर्थक रहा है। भारत के रुख को निम्नलिखित ठोस आंकड़ों और तर्कों से समझा जा सकता है:

  • कम ऐतिहासिक योगदान: 1850 से लेकर अब तक के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक संचयी (Cumulative) ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी मात्र 4% से 5% के आसपास है, जबकि वैश्विक आबादी में भारत की हिस्सेदारी लगभग 17% से अधिक है।
  • कम प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (Per Capita Emissions): भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन वैश्विक औसत से लगभग आधा (या वैश्विक औसत का लगभग 40%) है। विकसित देशों की तुलना में यह बहुत कम है।
  • सक्रिय और महत्वाकांक्षी लक्ष्य (NDCs): भारत केवल अधिकारों की बात नहीं करता, बल्कि जिम्मेदार वैश्विक नागरिक की तरह行动 भी करता है। भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था की उत्सर्जन तीव्रता (Emissions Intensity of GDP) को 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक 45% तक कम करने का संकल्प लिया था, जिसे आगे और बढ़ाते हुए नए लक्ष्यों (जैसे 2035 तक इसे 47% तक कम करना) की दिशा में कदम बढ़ाया है।
  • पंचामृत और नेट-जीरो लक्ष्य: भारत ने COP26 में 'पंचामृत' का संकल्प लिया और वर्ष 2070 तक 'नेट-जीरो' (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही, देश ने अपनी कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 50% से अधिक हिस्सा गैर-जीवाश्म ईंधन (Non-fossil fuels) स्रोतों से प्राप्त करने का मील का पत्थर हासिल कर लिया है।

3. विकसित देशों की दोहरी नीति और भारत की आपत्तियां

भारत लगातार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों (जैसे COP सम्मेलनों) में यह आवाज़ उठाता रहा है कि विकसित देश अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारियों से पीछे हट रहे हैं।

विशेषज्ञ टिप्पणी: "पर्यावरण की रक्षा के नाम पर विकासशील देशों पर अचानक और कठोर एकसमान नियम थोपना जलवायु अन्याय है। जब तक विकसित देश अपना ऐतिहासिक कर्ज (Climate Finance & Technology Transfer) नहीं चुकाते, तब तक न्यायसंगत पर्यावरण नीति अधूरी है।"

भारत का कड़ा रुख इन दो प्रमुख बिंदुओं पर टिका है:

  1. जलवायु वित्त (Climate Finance): विकसित देशों ने विकासशील देशों को हरित तकनीकों अपनाने के लिए प्रति वर्ष अरबों-खरबों डॉलर देने का वादा किया था, जो अभी तक पूरी ईमानदारी से पूरा नहीं हुआ है।
  2. ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security): भारत जैसे विशाल विकासशील देश के लिए अपनी 1.4 अरब से अधिक आबादी को सस्ती बिजली और विकास के अवसर देना अनिवार्य है। ऐसे में कोयले या अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों से एकदम से किनारा करना बिना पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता के असंभव है।

निष्कर्ष

पर्यावरणीय राजनीति के वर्तमान दौर में भारत ने यह साबित कर दिया है कि वह समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का एक मजबूत स्तंभ है। भारत का रुख स्पष्ट है—पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते वैश्विक समुदाय CBDR के सिद्धांत का ईमानदारी से पालन करे और जलवायु न्याय को प्राथमिकता दे।

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