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एकदलीय प्रभुत्व से लेकर गठबंधन की राजनीति

एकदलीय प्रभुत्व से लेकर गठबंधन की राजनीति: क्षेत्रीय दलों का बढ़ता प्रभाव और केंद्र की सरकारों पर उनका असर

भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक यात्रा बेहद दिलचस्प, विविधतापूर्ण और समय के साथ निरंतर विकसित होने वाली रही है। यदि आप आज के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें, तो यह विश्वास करना कठिन हो सकता है कि कभी देश में एक ही दल का एकछत्र राज हुआ करता था। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर वर्तमान तक, भारतीय राजनीति ने एकदलीय प्रभुत्व (Single-Party Dominance) के दौर से गुजरते हुए गठबंधन की राजनीति (Coalition Politics) और अब क्षेत्रीय दलों के युग तक का लंबा सफर तय किया है। आम चुनावों (जैसे 2024 के लोकसभा परिणाम) और केंद्र की सियासत में क्षेत्रीय दलों की निर्णायक भूमिका को जोड़कर इस पूरी यात्रा और इसके प्रभावों की बात करते हैं।

1. एकदलीय प्रभुत्व का दौर: 'कांग्रेस सिस्टम' (1950-1960 का दशक)

आजादी के तुरंत बाद के दशकों में भारतीय राजनीति पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) का पूर्ण वर्चस्व था। प्रख्यात राजनीति विज्ञानी रजनी कोठारी ने इस दौर को 'कांग्रेस सिस्टम' का नाम दिया था।

  • राजनीतिक स्थिति: केंद्र और देश के लगभग सभी राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकारें थीं। विपक्ष बेहद कमजोर, बिखरा हुआ और वैचारिक रूप से विभाजित था।
  • मुख्य आधार: स्वतंत्रता संग्राम की ऐतिहासिक विरासत, राष्ट्र निर्माण की भावना और पंडित जवाहरलाल नेहरू का करिश्माई नेतृत्व इस प्रभुत्व का मुख्य आधार था। विपक्ष के पास न तो कोई सुदृढ़ राष्ट्रीय विकल्प था और न ही मजबूत जमीनी संगठन।

2. क्षेत्रीय दलों का उभार और गठबंधन की राजनीति की शुरुआत (1970-1990 का दशक)

कांग्रेस के एकाधिकार को पहली बड़ी वैचारिक और चुनावी चुनौती 1967 के चुनावों में मिली, जब कई राज्यों में 'गैर-कांग्रेसवाद' के नारे के तहत सरकारें बनीं। इसके बाद क्षेत्रीय आकांक्षाओं, स्थानीय अस्मिता और सामाजिक न्याय (जैसे पिछड़ों, दलितों और क्षेत्रीय समूहों का उभार) के कारण क्षेत्रीय दलों का तेजी से विकास हुआ।

  • क्षेत्रीय दलों का जन्म: तमिलनाडु में द्रमुक (DMK) और अन्नाद्रमुक (AIADMK), आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (TDP), उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP), तथा बिहार में जनता दल से निकले विभिन्न दल (जैसे राजद, जदयू आदि) क्षेत्रीय राजनीति के मजबूत स्तंभ बने।
  • गठबंधन युग का सूत्रपात: 1989 के बाद से देश में किसी एक पार्टी को अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिलना बंद हो गया। यहीं से 'गठबंधन की राजनीति' (Coalition Era) की शुरुआत हुई, जहाँ सरकार चलाने के लिए राष्ट्रीय दलों को छोटे और क्षेत्रीय दलों का समर्थन लेना अनिवार्य हो गया।

3. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य: क्षेत्रीय दलों का केंद्र की राजनीति पर गहरा असर

हालिया लोकसभा चुनावों (विशेषकर 2024 के परिणाम) ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र में क्षेत्रीय दलों की अनदेखी नहीं की जा सकती। आज केंद्र की राजनीति पर इनका निर्णायक प्रभाव साफ दिखाई देता है:

  • गठबंधन सरकार और मोलभाव (Bargaining Power) की राजनीति: वर्तमान में टीडीपी (TDP) और जदयू (JDU) जैसे क्षेत्रीय दल केंद्र सरकार के स्थायित्व और नीतिगत स्थिरता के लिए मुख्य धुरी साबित हुए हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों को विशेष वित्तीय पैकेज, केंद्रीय योजनाओं में बड़ा हिस्सा और अपनी क्षेत्रीय माँगों को प्राथमिकता मिलनी शुरू हो जाती है।
  • राष्ट्रीय एजेंडे पर क्षेत्रीय प्रभाव: अब राष्ट्रीय दल केवल देशव्यापी मुद्दों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता, स्थानीय भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय विकास योजनाओं को भी अपने घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बनाते हैं। उदाहरण के लिए, बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे या विशेष पैकेज की माँग हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रही है।
  • क्षेत्रीय क्षत्रपों का दबदबा: आज कई राज्यों में क्षेत्रीय दल इतने मजबूत हैं कि वे राष्ट्रीय दलों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं या उनके साथ रणनीतिक गठबंधन करके सरकार चला रहे हैं (जैसे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस या महाराष्ट्र में विभिन्न क्षेत्रीय गुट)।

4. गठबंधन और क्षेत्रीय राजनीति के सकारात्मक व नकारात्मक पहलू

सकारात्मक पहलू:

  • विविधता का सही प्रतिनिधित्व: भारत जैसे बहु-सांस्कृतिक और बहु-भाषाई देश में क्षेत्रीय दलों के कारण देश के हर कोने, हर भाषा और हर उपेक्षित वर्ग की आवाज़ सीधे दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक पहुँचती है।
  • सत्ता का विकेंद्रीकरण: इससे केंद्र सरकार की निरंकुशता पर लगाम लगती है और राज्यों के साथ अधिक संतुलित व सहयोगात्मक संवाद स्थापित होता है।

नकारात्मक पहलू:

  • राजनीतिक अस्थिरता का जोखिम: अतीत में (विशेषकर 1990 के दशक में) गठबंधन सरकारों के बार-बार गिरने से नीतिगत निर्णय (Policy Paralysis) प्रभावित होते थे। हालांकि, हाल के वर्षों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका अधिक परिपक्व हुई है।
  • क्षेत्रीय सौदेबाजी: कई बार क्षेत्रीय दल अपने सीमित राजनीतिक स्वार्थों के लिए केंद्र पर अत्यधिक दबाव बनाते हैं, जिससे कई बार राष्ट्रीय हित पीछे छूट जाते हैं।

निष्कर्ष: संतुलित लोकतंत्र की ओर कदम

एकदलीय प्रभुत्व से शुरू होकर क्षेत्रीय दलों और गठबंधन की राजनीति तक का यह सफर इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि भारतीय मतदाता अब किसी एक दल के प्रति आँख मूंदकर निष्ठावान नहीं है, बल्कि वह अपनी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दोनों अपेक्षाओं को एक साथ साधना चाहता है।

आज का भारतीय लोकतंत्र एक ऐसे उन्नत मोड़ पर है जहाँ राष्ट्रीय दृष्टिकोण और क्षेत्रीय आकांक्षाओं का संतुलन ही देश की असली ताकत है। जब तक केंद्र और राज्य मिलकर सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना से काम करेंगे, तब तक भारत का लोकतांत्रिक ढांचा और अधिक मजबूत होता रहेगा।

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