लोकतंत्र की धुरी: शासन प्रणालियों का तुलनात्मक विश्लेषण और भारत
किसी भी राष्ट्र के सुचारू संचालन के लिए उसकी शासन प्रणाली रीढ़ की हड्डी समान होती है। जब हम वैश्विक लोकतंत्रों का अध्ययन करते हैं, तो मुख्य रूप से दो प्रणालियां सबसे आगे नजर आती हैं—संसदीय प्रणाली और अध्यक्षात्मक प्रणाली। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय स्वरूप को अपनाया। इसके बावजूद, समय-समय पर यह विमर्श राजनीतिक गलियारों में गूंजता रहता है कि क्या भारत के परिदृश्य में अध्यक्षात्मक ढांचा अधिक फलदायी सिद्ध हो सकता था? हम इन दोनों व्यवस्थाओं की कार्यशैली और समकालीन परिप्रेक्ष्य का विस्तार से मूल्यांकन करेंगे।
1. संसदीय मॉडल: संरचना, जवाबदेही और कार्यप्रणाली
संसदीय व्यवस्था की मूल आत्मा कार्यपालिका और विधायिका के बीच घनिष्ठ सहयोग और समन्वय में निहित होती है। इस व्यवस्था में राष्ट्र प्रमुख के रूप में राष्ट्रपति संवैधानिक दायित्व निभाते हैं, जबकि शासन की वास्तविक कमान प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के हाथ में होती है।
- प्रत्यक्ष उत्तरदायित्व: इस ढांचे में सरकार का हर निर्णय और नीति सीधे तौर पर संसद के प्रति जवाबदेह होती है। मंत्रीगण सदन में सवालों के घेरे में रहते हैं।
- सामूहिक निर्णय: इसमें एकल व्यक्ति के निर्णय के बजाय सामूहिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे किसी एक व्यक्ति द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की आशंका घट जाती है।
- समकालीन परिदृश्य: हाल ही में भारतीय संसद के गलियारों में नए कानूनों के निर्माण और डिजिटल पहलों के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस और चर्चाएं देखने को मिलीं। यह इस बात का प्रमाण है कि संसद वह मंच है जहाँ नीतियों पर व्यापक मंथन होता है, हालांकि कई बार राजनीतिक गतिरोध भी कामकाज को प्रभावित करते हैं।
2. अध्यक्षात्मक मॉडल: शक्ति पृथक्करण और निश्चित कार्यकाल
इसके विपरीत, अध्यक्षात्मक मॉडल (जिसका उत्कृष्ट उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका है) स्पष्ट शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर काम करता है। इसमें राष्ट्रपति कार्यपालिका के सर्वेसर्वा होते हैं और वे अपने फैसलों के लिए सीधे तौर पर विधायिका के प्रति उत्तरदायी नहीं होते।
- स्थिरता और स्वतंत्रता: इस प्रणाली में राष्ट्रपति का कार्यकाल निश्चित होता है, जिससे वे राजनीतिक उथल-पुथल की चिंता किए बिना दीर्घकालिक नीतियों को लागू कर सकते हैं। वे अपनी पसंद के किसी भी विशेषज्ञ को मंत्रिमंडल में शामिल करने के लिए स्वतंत्र होते हैं।
- नियंत्रण और संतुलन: इसमें विधायिका और कार्यपालिका दोनों स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं।
- समकालीन परिदृश्य: अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों या अन्य अध्यक्षात्मक राष्ट्रों की कार्यशैली में यह स्पष्ट दिखता है कि राष्ट्रपति अपने प्रशासन के चयन में पूर्णतः स्वायत्त होते हैं, भले ही संसद (कांग्रेस) के साथ बजट या अन्य नीतियों को लेकर उनका तीव्र गतिरोध क्यों न चल रहा हो।
3. भारत के दृष्टिकोण से कौन सी व्यवस्था अधिक प्रासंगिक है?
भारत एक विशाल महाद्वीप जैसी विविधता वाला देश है, जहां सैकड़ों भाषाएं, संस्कृतियां और अनगिनत समुदाय निवास करते हैं। ऐसे देश में संसदीय प्रणाली ही सबसे उपयुक्त साबित हुई है, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- समावेशी प्रतिनिधित्व: यह व्यवस्था देश के दूरदराज के कोनों और छोटे-छोटे समुदायों को भी राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखने का माध्यम प्रदान करती है।
- संघीय संतुलन की रक्षा: अध्यक्षात्मक प्रणाली में सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का जोखिम होता है, जो भारत जैसे बहु-राज्यीय और विविधतापूर्ण संघीय ढांचे के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
- समकालीन परिदृश्य: देश के विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों का निरंतर उभरना और केंद्र में मिली-जुली सरकारों या मजबूत दलों के साथ क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सामंजस्य यह साबित करता है कि हमारी विविधता को केवल एक समावेशी संसदीय मंच ही संभाल सकता है।
निष्कर्ष: भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई बनावट को देखते हुए संसदीय व्यवस्था ही देश को एक सूत्र में पिरोए रखने में सक्षम रही है। प्रणाली में दोष सुधार की गुंजाइश छोड़ते हैं, किंतु इसके मूल स्वरूप को बदलना भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत हो सकता है।
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