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पड़ोसी पहले नीति : दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरण

पड़ोसी पहले नीति: दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक समीकरण और भारत-मालदीव-बांग्लादेश संबंध

दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य पिछले कुछ समय से अत्यधिक गतिशील और परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। भारत ने अपनी विदेश नीति के केंद्र में "पड़ोसी पहले" (Neighborhood First) के दृष्टिकोण को रखा है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता, आर्थिक सहयोग और रणनीतिक विश्वास को मजबूत करना है। हालांकि, कूटनीति की दुनिया में सत्ता समीकरणों का पलटना स्वाभाविक है। विशेष रूप से मालदीव और बांग्लादेश के সাম্প্রতিক घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय राजनीति में संतुलन बनाए रखना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है।

1. भारत-मालदीव संबंध: तनाव के दौर से व्यावहारिक संवाद तक

मालदीव की सामरिक स्थिति हिंद महासागर में भारत की सुरक्षा के लिए बेहद अहम है। पिछले कुछ वर्षों में मालदीव की घरेलू राजनीति में आए बदलावों के कारण दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव देखे गए हैं।

  • 'इंडिया आउट' अभियान और शुरुआती तनाव: मालदीव की राजनीति में एक समय वहां भारत विरोधी भावनाओं और 'इंडिया आउट' कैंपेन को हवा दी गई, जिससे द्विपक्षीय कूटनीति प्रभावित हुई।
  • आर्थिक वास्तविकताओं से आया बदलाव: गंभीर आर्थिक मंदी, विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट और पर्यटन क्षेत्र में झटकों के कारण मालदीव को यह अहसास हुआ कि भारत के बिना क्षेत्रीय स्थिरता और वित्तीय मदद मुश्किल है। भारत द्वारा समय पर वित्तीय सहायता (जैसे ट्रेजरी बिल और मुद्रा विनिमय समझौते) प्रदान की गई, जिससे स्थिति में सुधार हुआ।
  • व्यावहारिक कूटनीति की जीत: दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय वार्ताओं और विकास परियोजनाओं (जैसे ग्रेटर माले कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट) ने यह स्पष्ट कर दिया कि भौगोलिक और ऐतिहासिक निकटता किसी भी तात्कालिक राजनीतिक बयानबाजी से अधिक मजबूत है।

2. भारत-बांग्लादेश संबंध: राजनीतिक परिवर्तन और नई कूटनीतिक चुनौतियाँ

बांग्लादेश, भारत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ोसी है, जिसके साथ भारत की सबसे लंबी सीमा और गहरे सांस्कृतिक संबंध हैं। पिछले कुछ समय में वहां हुए सत्ता परिवर्तनों ने द्विपक्षीय समीकरणों को नए सिरे से परिभाषित किया है।

  • राजनीतिक उथल-पुथल का प्रभाव: अगस्त 2024 में हुए राजनीतिक बदलाव और अंतरिम प्रशासन के आने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में कुछ समय के लिए संशय और कूटनीतिक ठहराव देखा गया। पूर्व नेतृत्व के प्रत्यर्पण और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच संवाद जारी है।
  • संस्थागत और व्यापारिक संवाद: इन राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद, भारत और बांग्लादेश ने व्यापार, वीज़ा और कांसुलर मामलों पर संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) की बैठकों के जरिए निरंतर संवाद बनाए रखने का प्रयास किया है, जो यह दर्शाता है कि दोनों देश आर्थिक interdependence को महत्व देते हैं।
  • रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी संवेदनशीलताएं: सीमा प्रबंधन, तीस्ता जल विवाद और गंगा जल संधि जैसे अहम मुद्दों पर आगामी समय में तकनीकी और राजनीतिक स्तर पर संवाद दोनों देशों के दीर्घकालिक हितों के लिए अनिवार्य है।

3. दक्षिण एशिया में भारत की रणनीति की दिशा और वर्तमान आयाम

इन तमाम क्षेत्रीय बदलावों के बीच भारत की "पड़ोसी पहले" नीति अब अधिक परिपक्व, लचीلی और ज़मीनी वास्तविकताओं पर आधारित हो गई है।

  • आर्थिक और मानवीय सहायता (First Responder): भारत ने यह साबित किया है कि संकट के समय (चाहे वह मालदीव का आर्थिक संकट हो या क्षेत्रीय आपदाएं) वह सबसे पहले मदद के लिए आगे आने वाला देश है।
  • चीन के प्रभाव का मुकाबला: दक्षिण एशिया में चीन की बढ़ती आर्थिक और सामरिक पैठ के बीच भारत अपनी विकासात्मक परियोजनाओं, कनेक्टिविटी और सुरक्षा सहयोग के जरिए अपनी केंद्रीय स्थिति को बनाए रखने के लिए पूरी तरह सक्रिय है।

मुख्य बिंदु: कूटनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन भौगोलिक वास्तविकताएं और परस्पर आर्थिक जरूरतें अंततः देशों को सहयोग के मंच पर वापस ले आती हैं। भारत का रुख स्पष्ट है कि एक मजबूत, स्थिर और समृद्ध पड़ोसी ही क्षेत्रीय शांति की सबसे बड़ी गारंटी है।

निष्कर्ष

दक्षिण एशिया में बदलते समीकरण यह सिखाते हैं कि कूटनीति एक निरंतर और गतिशील प्रक्रिया है। भारत-मालदीव और भारत-बांग्लादेश के रिश्ते इस बात का प्रमाण हैं कि क्षेत्रीय नेतृत्व को बनाए रखने के लिए धैर्य, सतत संवाद, संप्रभुता का सम्मान और रणनीतिक सूझबूझ की आवश्यकता होती है। आने वाले समय में भारत की यह परिपक्व नीति न केवल उसकी अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा को सुरक्षित रखेगी, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र को एक नए आर्थिक और रणनीतिक स्थिरता के मुकाम पर ले जाएगी।

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