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भारतीय लोकतंत्र

भारतीय लोकतंत्र: वर्तमान स्वरूप, चुनौतियां और तानाशाही की ओर बढ़ते अदृश्य कदम

भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य माना जाता है। छब्बीस जनवरी 1950 को लिखित संविधान के प्रवृत्त होने के पश्चात से भारतीय व्यवस्था ने अनेक पड़ावों को पार किया है। वर्तमान समय में यह प्रणाली मात्र एक शासन प्रबंध तक सीमित न रहकर बहुसांस्कृतिक समाज की आशाओं और आकांक्षाओं का जीवंत प्रतीक बन चुकी है।

1. भारतीय लोकतंत्र की समकालीन स्थिति एवं विशेषताएँ

आज का भारतीय तंत्र पारंपरिक राजनीतिक गतिविधियों से आगे बढ़कर डिजिटल और सहभागितामूलक युग में प्रवेश कर चुका है। इसकी मुख्य विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत देखा जा सकता है:

  • सक्रिय मतदाता सहभागिता: विभिन्न स्तर के चुनावों में उच्च मतदान प्रतिशत इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आम नागरिकों की लोकतांत्रिक संस्थाओं में गहरी निष्ठा है।
  • तकनीकी समावेश और पारदर्शिता: निर्वाचन प्रक्रियाओं में आधुनिक तकनीक के प्रयोग से मतदान से लेकर परिणाम घोषणा तक की पूरी प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित हुई है।
  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं का उभार: राष्ट्रीय दलों के समानांतर क्षेत्रीय संगठनों की सक्रियता ने विकेंद्रीकृत संघीय ढांचे को और अधिक सुदृढ़ किया है।

2. समकालीन उदाहरण और लोकतांत्रिक आयाम

वर्तमान भारतीय लोकतंत्र की कार्यप्रणाली को निम्नलिखित व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से समझा जा सकता है:

क. स्थानीय निकायों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत महिलाओं को मिले आरक्षण ने ग्रामीण प्रशासन की तस्वीर बदल दी है। आज दूरदराज के अंचलों में महिलाएं जनप्रतिनिधि के रूप में निर्णय ले रही हैं। हालांकि, पितृसत्तात्मक सोच और 'सरपंच पति' जैसी प्रवृत्तियों के कारण उनकी स्वतंत्र कार्यप्रणाली में अभी भी व्यावहारिक बाधाएं बनी हुई हैं, जो प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता को दर्शाती हैं।

ख. ई-गवर्नेंस और डिजिटल जन-सहभागिता

नीति निर्माण में नागरिकों की सीधी भागीदारी डिजिटल पोर्टल्स और लोक-परामर्श प्रक्रियाओं के माध्यम से बढ़ी है। सूचना के अधिकार जैसे उपकरणों ने प्रशासनिक जवाबदेही तय करने में नागरिकों को सशक्त किया है।

ग. संवैधानिक संतुलन और न्यायपालिका की भूमिका

लोकतंत्र के तीनों अंगों के मध्य सामंजस्य और वैचारिक भिन्नता एक जीवंत व्यवस्था का लक्षण है। उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्णय नागरिकों के मूल अधिकारों के संरक्षण और संविधान की मूल संरचना की रक्षा में मील के पत्थर साबित हुए हैं।

3. लोकतांत्रिक क्षरण और अधिनायकवादी प्रवृत्तियों की ओर झुकाव

राजनीति शास्त्र में इसे 'डिमॉक्रेटिक बैकस्लाइडिंग' कहा जाता है, जहां अधिनायकवाद पारंपरिक सैन्य तख्तापलट के बजाय लोकतांत्रिक विधियों का उपयोग करते हुए भीतर से संस्थाओं को कमजोर करके स्थापित होता है। आधुनिक शासन प्रणालियों में इसके प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं:

क. स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता का संकुचन

निर्वाचन आयोग, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक जैसी संस्थाओं की तटस्थता पर वैचारिक प्रश्न उठने लगे हैं। जब इन स्वायत्त निकायों का उपयोग सत्ता विरोधी स्वरों को नियंत्रित करने के लिए होने लगे, तो यह संतुलन के ह्रास का स्पष्ट संकेत बनता है।

ख . मीडिया की भूमिका और सूचनाओं पर नियंत्रण

लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ माने जाने वाले मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जनहित के मुद्दों के बजाय सत्ता के अनुकूल प्रचार का माध्यम बनता जा रहा है। स्वतंत्र पत्रकारों या संस्थाओं पर विधिक दबाव और सेंसरशिप के प्रयास समाज में निष्पक्ष सूचनाओं के प्रवाह को बाधित करते हैं।

ग. असहमति का अपराधीकरण और विपक्षी शून्यता

मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है, किंतु समकालीन राजनीति में विपक्षी दलों को आर्थिक और रणनीतिक रूप से कमजोर करने के प्रयास किए जाते हैं। नीतियों के विरुद्ध उठने वाले हर स्वर को राष्ट्र विरोधी मान लेना स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार को गंभीर चुनौती देता है।

घ. विधायी प्रक्रियाओं की उपेक्षा और बहुसंख्यकवाद

संसदीय बहसों को संक्षिप्त किए बिना या महत्वपूर्ण विधेयकों को बिना व्यापक विचार-विमर्श के पारित कराना इस बात का द्योतक है कि विधायिका कार्यपालिका के अधीन होती जा रही है। यह प्रवृत्ति बहुसंख्यकवादी संस्कृति को बढ़ावा देती है।

4. निष्कर्ष

भारतीय लोकतंत्र कोई स्थिर अवधारणा नहीं, बल्कि निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया है। संस्थागत नियंत्रण और असहमति के संकुचन जैसी प्रवृत्तियों के बीच नागरिकों की राजनीतिक सजगता ही लोकतंत्र की वास्तविक रक्षा कवच है। व्यवस्था को सुदृढ़ रखने के लिए संस्थागत स्वायत्तता और संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना अनिवार्य है।


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