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G -20 और भारत

वैश्विक संगठन जी-20, कूटनीति और भारत की निर्णायक भूमिका: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

परिचय

वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है। इनमें जी-20 (Group of 20) वैश्विक आर्थिक सहयोग का एक प्रमुख मंच है। शुरुआत में यह केवल वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंकों के गवर्नर्स का एक मंच था, परंतु समकालीन समय में यह वैश्विक कूटनीति और कूटनीतिक रणनीतियों का केंद्र बिंदु बन चुका है। यह मंच दुनिया की प्रमुख उन्नत और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ लाता है, जिससे वैश्विक नीतियों के निर्धारण में इसकी महत्ता लगातार बढ़ रही है।

जी-20 की संरचना और कार्यप्रणाली

जी-20 समूह की संरचना इसे अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अलग और प्रभावशाली बनाती है।

  • सदस्यता: इसमें 19 देश और दो प्रमुख क्षेत्रीय निकाय—यूरोपीय संघ (EU) और अफ्रीकी संघ (AU) शामिल हैं।
  • ट्रोइका प्रणाली: जी-20 का कोई स्थायी सचिवालय नहीं होता है। इसकी निरंतरता बनाए रखने के लिए ट्रोइका (Troika) व्यवस्था काम करती है, जिसमें पिछले, वर्तमान और आगामी अध्यक्ष देश शामिल होते हैं।
  • दो मुख्य ट्रैक: इसकी पूरी कार्यप्रणाली दो मुख्य धाराओं—शेरपा ट्रैक (सामाजिक-आर्थिक और विकास संबंधी मुद्दे) और वित्त ट्रैक (राजकोषीय और मौद्रिक नीतियां)—पर आधारित होती है।

वैश्विक कूटनीति में जी-20 की प्रासंगिकता

जी-20 केवल आर्थिक समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक कूटनीति को दिशा देने का एक शक्तिशाली माध्यम है। इसके कूटनीतिक महत्व को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

  1. ग्लोबल साउथ की आवाज: हाल के वर्षों में इस मंच ने विकासशील देशों और अल्पविकसित देशों के हितों को वैश्विक पटल पर मजबूती से रखा है। अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिलना इस दिशा में कूटनीति का एक ऐतिहासिक कदम था।
  2. बहुपक्षीय संवाद का सेतु: महाशक्तियों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ध्रुवीकरण के दौर में जी-20 वह मंच प्रदान करता है जहाँ विरोधी देश भी वैश्विक कल्याण के मुद्दों पर एक टेबल पर बैठकर चर्चा कर सकते हैं।
  3. संकट प्रबंधन: वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी से लेकर महामारीोत्तर आर्थिक पुनरुद्धार तक, इस संगठन ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को बचाने में सामूहिक नेतृत्व का उत्कृष्ट उदाहरण पेश किया है।

वैश्विक कूटनीति में भारत की केंद्रीय और निर्णायक भूमिका

भारत की अध्यक्षता (विशेषकर नई दिल्ली शिखर सम्मेलन और उसके बाद के घटनाक्रम) के दौरान जी-20 की कूटनीति में एक नया और दूरदर्शी आयाम जुड़ा है। भारत ने अपनी कूटनीतिक कुशलता से इस मंच को केवल पश्चिमी देशों या आर्थिक महाशक्तियों तक सीमित न रखकर 'ग्लोबल साउथ' (Global South) की आकांक्षाओं का मुख्य केंद्र बना दिया। भारत की भूमिका के निम्नलिखित प्रमुख उदाहरण और पहलू वैश्विक मंच पर मील का पत्थर साबित हुए हैं:

  • नई दिल्ली घोषणापत्र और सर्वसम्मति की कूटनीति: भू-राजनीतिक और वैचारिक ध्रुवीकरण (विशेषकर रूस-यूक्रेन संघर्ष के मुद्दों पर) के कारण जब पूरी दुनिया बंटी हुई थी और किसी भी सर्वसम्मत घोषणापत्र पर पहुंचने की उम्मीदें लगभग समाप्त हो चुकी थीं, तब भारत ने अपनी 'वसुधैव कुटुंबकम्' (एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य) की भावना के तहत अभूतपूर्व और शत-प्रतिशत सर्वसम्मति (100% Consensus) वाला 'नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन' पारित करवाया। यह आधुनिक वैश्विक कूटनीति का सबसे बड़ा कूटनीतिक और राजनयिक कौशल माना जाता है।
  • अफ्रीकी संघ (AU) को स्थायी सदस्यता: भारत की पहल पर 55 देशों के महाद्वीप 'अफ्रीकी संघ' को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाई गई। यह कदम दशकों से उपेक्षित 'ग्लोबल साउथ' को वैश्विक शासन के शीर्ष पर स्थापित करने की दिशा में भारत की समावेशी कूटनीति का सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर (DPI) और तकनीक की कूटनीति: भारत ने अपनी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (जैसे आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर) के मॉडल को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया। जी-20 मंच के माध्यम से यह स्वीकार किया गया कि समावेशी विकास के लिए तकनीक का लोकतंत्रीकरण और पारदर्शिता कितनी आवश्यक है।
  • ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस (GBA) और हरित ऊर्जा: पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर भारत ने जी-20 के मंच से 'ग्लोबल बायोफ्यूल अलायंस' की शुरुआत की, जो जीवाश्म ईंधन से हटकर टिकाऊ और हरित ऊर्जा विकल्पों की ओर वैश्विक कूटनीति को मोड़ने का एक ठोस प्रयास है।
  • मानव-केंद्रित वैश्वीकरण का एजेंडा: भारत ने जीडीपी-केंद्रित विकास के पारंपरिक दृष्टिकोण को बदलकर उसे मानव-केंद्रित वैश्वीकरण (Human-Centric Globalization) की ओर मोड़ने पर जोर दिया, जिसमें महिला-नेतृत्व विकास (Women-led Development) को मुख्यधारा में लाया गया।

चुनौतियां और भविष्य की राह

अपनी तमाम सफलताओं के बावजूद, जी-20 के समक्ष कई कूटनीतिक और व्यावहारिक चुनौतियां भी मौजूद हैं:

  • बाध्यकारी निर्णयों का अभाव: इस मंच के समझौते और घोषणाएं कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होती हैं, जिससे कई बार सदस्य देशों द्वारा वादों को पूरा करने में ढिलाई देखी जाती है।
  • भू-राजनीतिक खींचतान: सदस्य देशों के बीच आपसी मतभेद और वैचारिक दूरियां कई बार सर्वसम्मति से बनने वाले घोषणापत्रों को प्रभावित करती हैं।

निष्कर्ष: भू-राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच जी-20 महज एक आर्थिक मंच से आगे बढ़कर वैश्विक कूटनीति की धुरी बन चुका है। इसमें भारत की मुखर, संतुलित और समावेशी कूटनीति ने यह साबित कर दिया है कि भारत आज वैश्विक समस्याओं के समाधान में एक 'विश्वमित्र' (Global Friend) और लीडर की भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम है। यह संगठन इस बात का प्रतीक है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान अकेले किसी देश के पास नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग और बहुपक्षीय संवाद में ही निहित है।

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