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संघीय ढांचा (केंद्र राज्य संबंध)

26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो राष्ट्र के लिए न्याय ,समता , स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्शों की प्राप्ति सर्वोच्च मानी गई। संविधान में समता पर दिया गया सारा जोर संघीय भावना और विचारों के इर्द गिर्द निर्मित सभी व्यवस्थाओं में दिखाई देता है । विभिन्न राज्यों की जनसंख्या की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए संविधान के निर्माताओं ने सरकारों के विभिन्न स्तरों पर शक्तियों और उत्तरदायित्वों के न्यायसंगत हिस्सेदारी का प्रावधान किया गया । भारतीय संघवाद की प्रकृति को के० सी ० व्हियर ने अर्द्ध संघीय (quasi fedral) बताया है। राज्यों एवम् केंद्र से संबंधित विधायी शक्तियां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 245 से 254 tk वर्णित हैं। शासन व्यवस्था दो प्रकार की हो सकती है: संघात्मक  एकात्मक संघात्मक  एक ऐसी शासन व्यवस्था जहाँ केंद्र के साथ राज्य सरकारों का अस्तित्व हो तथा केंद्र और राज्यों के बीच कार्यों का बटवारा होता हो। इस प्रकार की व्यवस्था को संघात्मक शासन व्यवस्था कहा जाता है। इसका उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका है। एकात्मक एक ऐसी शासन व्यवस्था जहाँ राज्य सरकारों का कोई अस्तित्व नह...

भारतीय न्यायपालिका

सरकार के तीन अंग होते हैं व्यवस्थापिका ,कार्यपालिका और न्यायपालिका। न्यायपालिका का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया है। न्यायपालिका निष्पक्ष एवं स्वायत्त संस्था है। सर्वप्रथम सन 1773 के रेग्युयलेक्टिंग एक्ट के द्वारा कोलकत्ता सन 1774 में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया गया था। लार्ड इम्पैड इसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश बने। इसके पश्चात 1935 भारत शासन अधिनियम द्वारा दिल्ली में संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया। 1अक्टूबर 1937 को दिल्ली में स्थापित हुआ।इसके मुख्य न्यायाधीश मॉरिस ग्वेयर रहे। यह सर्वोच्च न्यायालय नहीं संघीय न्यायालय था क्योंकि इसके निर्णय के विरुद्ध लंदन प्रिवी कौंसिल में अपील की जा सकती थी। वर्तमान उच्चतम न्यायालय की स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई। हरिलाल कानिया उच्चतम न्यायालय के प्रथम मुख्य न्यायाधीश रहे। उच्चतम न्यायालय  अनुच्छेद 124 में लिखा है कि उच्चतम न्यायालय में 1 मुख्य न्यायाधीश और 7 न्यायाधीश होंगे साथ ही साथ अनुच्छेद 124 में यह भी लिखा है कि संसद कानून बनाकर न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि कर सकती है।   उच्चतम न्यायालय में वर्तमान समय ...

दबाव समूह (Pressure Groups )

आर्थिक , सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से जुड़े हुए हितों और विविध गतिविधियों के प्रतिनिधित्व के लिए दबाब समूहों का विकास हुआ है।सभी प्रकार के समाज और शासन व्यवस्था में दबाब समूह विद्यमान रहे हैं।वर्तमान में दबाव समूह राजनीति में एक संस्था के रूप में कार्य कर रहे हैं। 1908 में आर्थर बेंटेले  की पुस्तक प्रोसेस ऑफ गवर्नमेंट  और डेविड बी.ट्रूमैन की पुस्तक गवर्नमेंट प्रोसेस ने दबाब समूहों के अध्ययन को महत्वपूर्ण विषय बना दिया है। प्रो० फाइनर ने दबाब समूह को  अज्ञात साम्राज्य कहा है। प्रारंभ में संयुक्त राज्य अमेरिका,ब्रिटेन,फ्रांस और इटली में दबाव समूह सक्रिय थे परन्तु अब विकासशील देशों में भी दबाव समूह आस्तित्व में आ गए हैं। राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया में दबाव समूह महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करते हैं जबकि स्वयं चुनाव नहीं लड़ते। दबाव समूह का अर्थ एवं परिभाषा- दबाव समूह से हमारा अभिप्रायः सरकारी संरचना के बाहर संगठित किसी ऐच्छिक समूह से है जो सरकारी कर्मचारियों की भर्ती अथवा मनोनयन ,सार्वजनिक नीति तथा इसके प्रशासन व न्यायविधान को प्रभावित करने का प्रयास करता है। ये ऐसे समू...

राजनीतिक दल

आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत राजनीतिक दल एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। राजनीतिक दल एक प्रकार का व्यापक सामाजिक समूह है जिसके माध्यम से सामाजिक हितों एवं विचारों की पूर्ति आसानी से की जा सकती है। राजनीतिक दल ही सरकार का निर्माण कर नीतिगत प्रशासनिक संरचना का निर्माण करतें हैं। परिणामस्वरूप व्यक्तियो की सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा इन्हीं राजनीतिक दलों के माध्यम से होती है। राजनीतिक दलों के माध्यम से हम किसी समाज की व्यवस्था को सरलतापूर्वक समझ सकते हैं। राजनीतिक दल का अर्थ साधारण अर्थ  में राजनैतिक दल एक ऐसा स्वैच्छिक संगठन होता है जिसके सदस्यों के दृष्टिकोणों व उनके परस्पर उद्देश्यों में समानता पाई जाती है तथा वे सभी एक सिद्धान्त व विचारधारा के समर्थक होतें हैं एवं उससे सहमत होतें हैं। राजनैतिक दल सरकार बनाने व सत्ता प्राप्ति की होड़ में लगे रहतें हैं यदि सरकार नहीं बना पाते तो सरकार के बाहर रहकर जनता की बात को सरकार तक पहुंचाते रहते हैं रहते हैं तथा जनता को अपने राजनीतिक दल के सिद्धांत के पक्ष में लाने का प्रयास करते हैं। परिभाषा  मैंकाइवर के अनुसार " राजनीतिक ...

राज्यपाल

अनु०153 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। सातवाँ संविधान संशोधन द्वारा 1956 में इसमें संशोधन किया गया कि एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल बनाया जा सकता है । योग्यता अनु०157 में राज्यपाल पद की योग्यता का वर्णन है। भारत का नागरिक होना चाहिए। न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए। नोट किसी भी व्यक्ति को स्वयं के राज्य में राज्यपाल नहीं बनाया जाता है यह एक परम्परा है।  नियुक्ति  अनु०155 के अन्तर्गत इसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है। व्यवहार में यह नियुक्ति मंत्रिपरिषद की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। केंद्र राज्यों संबधो की जाँच करने हेतु 1983  सरकारिया आयोग का गठन किया गया था। वर्ष 2007 में पुंछी आयोग गठित किया गया। अनु०155 के तहत राष्ट्रपति इनकी नियुक्ति के संदर्भ में वारंट(अधिपत्र) जारी करते हैं जिसे मुख्य सचिव पढ़कर सुनाते हैं। शपथ - अनु०159 में राज्यपाल द्वारा ली जाने वाली शपथ के प्रारूप का उल्लेख है। राज्यपाल संविधान की रक्षा और लोगों के कल्याण की शपथ लेते हैं। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश/ वरिष्ठ न्यायाधीश द्वारा शपथ ...

भारत का राष्ट्रपति

संसदात्मक व्यवस्था में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका का निकट संबध है । इस व्यवस्था में कार्यपालिका दो प्रकार की होती है एक सवैंधानिक और वास्तविक । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 के अनुसार भारत का एक राष्ट्रपति होगा जो संघीय कार्यपालिका का प्रधान होगा। भारत का राष्ट्रपति इंग्लैंड की तरह देश पर राज्य करता है शासन नहीं। ब्रिटिश शासन में सम्राट की जो सवैधानिक प्रमुख स्थिति है वही स्थिति भारत में राष्ट्रपति की है। l राष्ट्रपति पद के लिए योग्यताएँ भारत का नागरिक होना चाहिए। वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो। वह लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो। वह लाभ के पद पर न हो। निर्वाचक मंडल भारत के राष्ट्रपति का निर्वाचन जिस निर्वाचक मंडल द्वारा होता है उसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य तथा राज्यो की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य सम्मिलित होते हैं। मनोनीत सदस्य इसलिए भाग नहीं लेते । राष्ट्रपति के  निर्वाचन मंडल का उल्लेख अनु० 54 में है । अनु० 55 में निर्वाचन पद्वति का उल्लेख किया गया है। एकल सक्रमंणीय आनुपातिक गुप्त मतदान प्रणाली के द्वारा निश्चत कोटा प्राप्त करने वाला...

भारत का उपराष्ट्रपति

अनु०63 में लिखा है कि There shall be a vice President. उपराष्ट्रपति का पद विषम परिस्थितियों में काम आता है। भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिये योग्यता   भारत का नागरिक होना चाहिए। न्यूनतम आयु 35 वर्ष होनी चाहिए।  लाभ के पद पर न हो।  राज्यसभा सदस्य बनने की योग्यता हो। निर्वाचक मंडल  संसद के मनोनीत एवं निर्वाचित सभी सदस्य भाग लेते हैं। निर्वाचन विधि  उपराष्ट्रपति का चुनाव एकल संक्रमणीय आनुपातिक गुप्त मतदान प्रणाली द्वारा होता है।20 प्रस्तावक 20 अनुमोदक होते हैं। जमानत राशि 15 हजार रुपये है । वैधमत का 1/6 प्राप्त न करने पर जमानत राशि जब्त हो जाती है। अनु० 324 के अन्तर्गत चुनाव आयोग  निर्वाचन प्रक्रिया सम्पन्न कराता है। । निर्वाचन में किसी भी तरह की समस्या होने पर अनु०71 के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय शिकायतों का निर्णय करता हैं। लोकसभा एवं राज्यसभा महासचिव पीठासीन/निर्वाचन अधिकारी के रूप में कार्य करते हैं। शपथ   उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति शपथ दिलातें हैं । अनु०69 के अन्तर्गत उपराष्ट्रपति संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं। उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के पद ...